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chhattisgarh : बस्‍तर में रामकथा

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। क्रम से नाम लें तो हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा। ग्रंथों के सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। ग्रंथ में छपा है मूल्य : आदिवासियों में निर्मूल्य वितरण। वैसे तो सेंटीमीटर और ग्राम में माप-तौल भी हो सकती है, लेकिन किसी ग्रंथ का ऐसा तथ्‍य-आग्रही मूल्य-महत्व बताना वाजिब नहीं, सो भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्‍या क्रमशः 688, 454 और 644 है।
प्रथम खण्ड माड़िया रामकथा (कोयामाटते रामना पाटा-वेसोड़) लिंगो ना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) के लिए कहा गया है कि यह ”रामकथा” बस्तर की माड़िया-जनजातियों की वाचिक परम्परा की पुनर्रचना है। यह भी बताया गया है कि बस्तर की माड़िया जनजाति दो वर्गों में विभाजित है- अबुझमाड़ की अबुझमाड़िया, तथा दक्षिण बस्तर की दंडामी माड़िया।
अबुझमाड़िया तथा दंडामी माड़िया यद्यपि जातीय नाम से समान हैं, किन्तु इनकी बोलियां आपस में दुर्बोध हैं। अबुझमाड़िया मुरिया के बहुत अधिक निकट है। कोई भी मुरिया अबुझमाड़िया को आसानी से समझ सकता है, किन्तु किसी दंडामी माड़िया के लिए अबुझमाड़िया एक अबूझ पहेली है।
संपादक ने स्पष्ट किया है कि- ”रामकथा की पुनर्रचना के लिए सबसे पहले मैंने इनके मौखिक साहित्य में व्याप्त रामकथा के संदर्भों का संकलन किया था और तदुपरांत टूटी हुई कड़ियों का तुलसीदास के रामचरितमानस के प्रसंग में ढालने का प्रयास किया।”
ग्रंथ की भूमिका में यह उपयोगी और रोचक स्पष्टीकरण है कि गोंडी की सभी बोलियों में लोकगीत के लिए पाटा शब्द समान रूप से प्रचलित है। लोककथाओं के यहां तीन रूप मिलते हैं-
(क) सामान्य कथा के लिए अबुझमाड़िया में पिटो, दंडामी माड़िया में वेसोड़, तथा दोर्ली में शास्त्रम शब्द प्रचलित है।
(ख) पौराणिक और धार्मिक कथाओं के लिए दंडामी माड़िया तथा दोर्ली में पुरवान शब्द प्रचलित है, जो पुराण का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है।
(ग) दंडामी माड़िया में वेसोड़ किसी कथा का वाचक है, जबकि दोर्ली में यह गीतकथा का उपलक्षक है। दंडामी माड़िया में गीतकथा के लिए पाटा-वेसोड़ शब्द प्रचलित है।
द्वितीय खण्ड मुरिया-रामचरितमानस लिंगोना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) में संपादक के अनुसार वे लगभग तीन दशकों तक मुरिया समाज में रामचरितमानस के गोंडी प्रारूप पर घोटुल के युवक-युवतियों के साथ बैठकर ‘पाटा’ बनाते रहे। उन्हीं के शब्दों में ”मैं इन युवक-युवतियों को मुरिया गोंडी में रामचरितमानस का अर्थ समझाता और अपने आशु कवित्व के कारण ये शीघ्र पाटा पारने लगते। दो दशक के बाद समूचे रामचरितमानस का इसीलिए (सन 1977 में) मुरिया में अनुवाद संभव हो सका।” इसके साथ मुरिया रामकथा के 36 लोक-गायकों और 4 गायिकाओं की सूची दी गई है।
हलबी रामकथा की भूमिका में संपादक का कथन है- ”1962 से 1992 के मध्य तीन दशकों तक मेरे द्वारा सम्पादित प्रेरित या लिखित अब तक दर्जनों ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें रामकथा, गुंसाई-तुलसीदास तथा हलबी-रामचरित मानस (अक्षरशः सम्पूर्ण अनुवाद) उल्लेखनीय है। प्रस्तुत ”हलबी-रामकथा-मंजूषा” में अब तक अप्रकाशित शेष रचनाओं का संग्रह है।

हलबी रामकथा के संपादकीय का अंश है-

”रामचरितमानस” भारतीय-साहित्यचो अनुपम गंगा आय। एचो अमरुतचो सुआदके सियान-सजन, माई-पीला पातो एसत। एचो थाहा पाउक नी होय। एचो खोलने, गड़ेयाने डुबकी मारुन गियानचो रतन पाउन-पाउन कितरोय लोग सवकार होते एसत।
ए बड़े हरिकचो गोठ आय कि हलबी ‘रामचरित’ असन मौंकाने मुर होयसे, जे मौंकाने आमचो देश आजादी चो ’50वीं बरिसगांठ’ मनाएसे। ‘रामचरितमानस’ चो लिखलो 500 बरख पूरली।
मके बिसवास आसे कि ए किताबचो अदिक चलन होयदे। बस्तरचो बनवासी-रयतचो सांस्कृतिक भूक बुतातो उवाटने ए पोथी खिंडिक बले साहा होली जाले, आजादीचो 50वीं बरिसगांठ चो भाइग होली समझा।

पश्‍च-लेख

ऊपर का लगभग पूरा हिस्सा इन ग्रंथों से लिया गया है। अब कुछ अपनी बात। वैसे तो थोड़ा कान खुला रखने वाले हिंदीभाषी के लिए समझना मुश्किल नहीं, फिर भी हलबी वाले पहले पैरा का अनुवाद इस तरह होगा-
रामचरितमानस भारतीय साहित्य की अनुपम गंगा है। इसके अमृत का स्वाद बड़े-बुजुर्ग, अबाल-वृद्ध पाते रहते हैं। इसकी थाह पाई नहीं जाती। इसकी गहराई में उतर कर, डुबकी मार के (लगाकर), ज्ञान का रत्न पा-पाकर कितने ही लोग साहूकार (सम्पन्न) होते रहते हैं।
भाषाई दृष्टि से अर्द्ध-मागधी या पूर्वी हिंदी की एक जबान (यहां तकनीकी-पारिभाषिक प्रयोजन न होने के कारण भाषा, बोली, उपभाषा के बजाय ‘जबान’ से काम चलाने का प्रयास है) छत्तीसगढ़ी है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के साथ उत्तरी भाग में सरगुजिया और दक्षिण में हलबी स्वरूप, व्यापक और लगभग संपूर्ण संपर्क माध्यम है। पेवर छत्तीसगढ़ी (ठेठ-खांटी छत्तीसगढ़ी में शुद्ध के लिए शायद अंगरेजी ‘प्योर’ का अपभ्रंश पेवर शब्द प्रचलित है) या मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ की जबान में भोजपुरी-मगही स्वाद लिए सरगुजिया (सादों या सादरी सहित) और मराठी महक व उड़िया छौंक वाली हलबी की भाषाशास्त्रीय विविधता रोचक है ही, इनकी वाचिक परम्परा के रस से थोड़ा परिचित होते ही, अरसिक भी इनमें ऊभ-चूभ होने लगता है। अपनी कहूं तो पहली जबान छत्तीसगढ़ी के बाद दोनों मौसियों सरगुजिया और हलबी से परिचित होने पर मुझे मातृभूमि पर सकारण गर्व होने लगा और भारतमाता के समग्र सांस्कृतिक रूप का कुछ अनुमान हो पाया।
त्वरित संदर्भ के लिए यह कि बस्तर अंचल पौराणिक-ऐतिहासिक दण्डकारण्य और महाकान्तार के नाम से जाना जाता था। पूर्व रियासत बस्तर का मुख्‍यालय आज की तरह ही जगदलपुर रहा, वैसे पुरातात्विक प्रमाणयुक्त बस्तर नाम का एक छोटा गांव भी जगदलपुर के पास ही है। रियासत के बाद बस्तर जिला, फिर संभाग बना। फिर उत्तरी बस्तर कांकेर जिला बना और दक्षिणी हिस्सा दंतेवाड़ा। सन 2007 से बीजापुर और नारायणपुर जिलों के गठन के बाद, अब 18 जिलों और 4 संभाग वाले छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर संभाग में 6, सरगुजा में 4, बिलासपुर में 3 तथा बस्तर संभाग में 5 जिले हैं।
कुछेक विद्वान रावण की लंका को बस्तर में ही मानते हैं। बस्तर के भाषाई-सांस्कृतिक सेतु स्वरूप इस ग्रंथ की तैयारी और प्रकाशन के दौरान न सिर्फ इसकी खोज-खबर रही, बल्कि एकाध अवसर पर मैंने सेतुबंध की गिलहरी-सा उत्साह भी महसूस किया था, वह आज रामनवमी पर याद कर रोमांचित हूं।

श्री हरिहर वैष्‍णव द्वारा ई-मेल से बस्‍तर में रामकथा पर प्राप्‍त महत्‍वपूर्ण सूचना (टिप्‍पणी के रूप में प्रकाशित) तथा दो छायाचित्र नीचे लगाए गए हैं –

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