शोधार्थियों द्वारा तैयार प्रो विश्वकर्मा का अभिनंदन ग्रन्थ विश्वकर्मायणम का लोकार्पण
एक बिरले आयोजन में इतिहास व पुरातत्व के छात्रों व शोधार्थियों ने अपने प्रिय सेवानिवृत्त प्राध्यापक के पचहत्तर वर्षीय होने पर अभिनंदन हेतु अमूल्य शोधपत्रों को इकट्ठा कर लगभग सात सौ पृष्ठों का विशद अभिनंदन ग्रन्थ प्रकाशित कर उन्हें सम्मानित किया। शिक्षा के क्षेत्र में आज के दौर में ऐसे श्रम साध्य अकादमिक कार्य बेहद महत्वपूर्ण होने के साथ साथ स्तुत्य है। ग्रन्थ का विमोचन रायपुर में हुआ जिसमें प्रदेश की जानी मानी अकादमिक हस्तियां शामिल हुईं।
छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ इतिहास व पुरातत्ववेत्ता व इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के इतिहास व पुरातत्व विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. आर एन विश्वकर्मा के अकादमिक योगदान के मान में यह ग्रन्थ प्रकाशित किया गया। राजधानी रायपुर के राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के कॉफी हाउस सभागार में ‘विश्कर्मायणम’ शीर्षक से प्रकाशित इस ग्रन्थ के विमोचन समारोह की मुख्य अतिथि प्रो विभा त्रिपाठी (अध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, बनारस हिंदू विश्विद्यालय) थीं। अपने उद्बोधन में प्रोफेसर त्रिपाठी ने प्रोफेसर विश्वकर्मा के अवदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस कार्यक्रम से स्पष्ट हो रहा है कि प्रोफेसर विश्वकर्मा अपने विद्यार्थियों शोधार्थियों और सहकर्मियों के बीच में कितने लोकप्रिय रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस ग्रंथ में केवल विश्वकर्मा जी पर केंद्रित आलेख नहीं है बल्कि भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व से जुड़े कई पहलुओं पर आलेख है। यह एक संग्रहणीय अकादमिक ग्रंथ है। यह युगों तक पढ़े जाने वाला ग्रन्थ है। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर एल एस निगम (पूर्वअध्यक्ष, इतिहास विभाग रविवि रायपुर व पूर्व कुलपति श्री शंकराचार्य विश्वविद्यालय भिलाई) ने बताया कि ऐसे अभिनंदन ग्रंथ दुर्लभ हैं। उन्होंने आगे बताया कि श्री विश्वकर्मा जी एक बेहतरीन प्राध्यापक होने के साथ-साथ एक अच्छे पुरातत्ववेत्ता भी है। अपने क्षेत्र में उनकी रुचि बहुत गहन रही है। वे अपने क्षेत्र के हर सेमिनार या कॉन्फ्रेंस में अपने शोध पत्र के साथ पहुंचते रहे हैं। उनकी लोकप्रियता और विद्यार्थियों के असीम प्रेम इस ग्रन्थ के रूप में रेखाँकित है। कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो एस के पांडेय ने इस अवसर पर अपने उद्धबोधन में कहा कि विश्वकर्मायणम इस बात का जीवंत उदाहरण है कि एक शिक्षक के समर्पण का प्रतिसाद का परिमाण कितना होता है। प्रो विश्वकर्मा ने उन्नीस शोधार्थियों को पी एच डी हेतु निर्देशित कर उच्च संस्थाओं में कार्य करने योग्य बनाया। गर्व का विषय है कि उनके विद्यार्थियों ने एक अद्भुत कार्य कर दिखाया है। वे बधाई के पात्र होने के साथ साथ अकादमिक क्षेत्र में कार्यरत जनों के लिए उदाहरण हैं। वे बेहद अनुशासित व ज्ञानी प्रो रहे हैं।
इस अवसर पर तकनीकी विश्विद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज (हयूमैनिटिज़) के चेयरमैन डॉ. चन्द्र शेखर शर्मा ने कहा कि विश्वकर्मायणम केवल एक मोटी किताब नहीं बल्कि ज्ञान और शिक्षिकीय सम्मान विद्यार्थीप्रेम का अनुपम उदाहरण है। प्रो विश्वकर्मा भारतीय इतिहास पुरातत्व व संस्कृति के प्रकांड विद्वान है। उनको सुनना बहुत रुचिकर होता है क्योंकि वे इतिहास को शब्दों और दिनांकों के बोझ में दबाने के बजाय प्रायोगिक संदर्भों के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनका विशद ज्ञान इतिहास के हर पक्ष को गहराई तक विश्लेषित करता है। वे स्वयं इतिहास और पुरात्तव का जीवित ग्रन्थ है। इतिहास की जानकारी उनके रगों में दौड़ती है। यह ग्रन्थ अपनी विशद सामग्री के कारण पठनीय और संग्रहणीय दोनों होगा। समारोह में वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता श्री जी एल रायकवार ने प्रो विश्कर्मा के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन डॉ सरिता साहू ने किया व आभार प्रदर्शन संस्कृति विभाग के कनिष्ठ निदेशक श्री प्रभात कुमार सिंह ने किया। इस अवसर पर अकादमिक क्षेत्र की कई जानी मानी हस्तियां उपस्थित थीं