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लालकिले की गूँज या सत्ता की मौन विडंबना?

डॉ. राजाराम त्रिपाठी

by satat chhattisgarh
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Echoes of the Red Fort

लालकिले से किसान का गुणगान

इस स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी ने लगभग पंद्रह बार किसानों का नाम लेकर उनकी मेहनत को सराहा, उनके हितों की रक्षा की बातें की । यह अभूतपूर्व घटना थी। देख-सुनकर तो अच्छा लगा कि किसान की गूंज राष्ट्रीय मंच पर पहुँची। पर सवाल उठता है कि क्या यह वही किसान नहीं था जिसे तीन साल पहले दिल्ली की सीमाओं पर ठिठुरन और बरसात झेलते रहना पड़ा? जिनसे एक बार बात करने की जरूरत भी माबदौलत ने नहीं समझी। जिनकी सात सौ से अधिक मौतों पर संसद में श्रद्धांजलि तक अर्पित न की जा सकी?
किसान की पीड़ा और सत्ता की सतत चुप्पी : : हमारे समाज में किसी भी घर का चूल्हा पड़ोसी अथवा मोहल्ले की किसी भी परिवार में किसी की भी मृत्यु पर ठंडा हो जाता है, लेकिन सत्ता ने किसानों की मौत दर मौत पर सतत चुप्पी साध ली। आंदोलन करते किसानों को न संवेदना मिली, न सम्मान। संसद के पवित्र मंच पर भी उनकी पीड़ा महज “मौन व्रत” में दबा दी गई। बात-बात पर घड़ियाली आंसुओं की दरिया बहाने वाले गलाबाज बहुरुपऐ नेताओं का भी शहीद किसानों के नाम पर गला तक नहीं रूंधा। पूरी दुनिया ने इसे देखा, इतिहास ने इसे काले अध्याय के रूप में दर्ज किया और देश ने इसे बिलाशक सत्ता की बेशर्मी का दर्जा दिया।

अन्नदाता ने हर संकट में देश के भोजन की थाली और गोदाम भरे , देश की रक्षा के लिए अपने बेटों को सरहद पर भेजा , युद्ध हो या महामारी, प्रतिबंध हों या मंदी, किसान कभी पीछे नहीं हटा। पर वही किसान जब अपने हक़ की माँग करता है, तो उसे कभी ‘अंदोलनजीवी’, कभी ‘राष्ट्रविरोधी’ कहकर कलंकित कर दिया जाता है। लालकिले से नाम गिनाना आसान है, मगर उसकी मौतों पर संसद की चुप्पी लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है। सवाल यह है कि “जय किसान” केवल नारा रहेगा या फिर एमएसपी कानून बनाकर इसे वास्तविक सम्मान दिया जाएगा?)

किसान संकटमोचक, फिर भी अपमानित : इतिहास गवाह है, जब जब देश संकट में फँसा, तब खेती ही संकटमोचक बनी। 1965 का युद्ध हो या 1971 की जंग, कारगिल का रण हो या परमाणु परीक्षणों के बाद के प्रतिबंध, कभी भी किसान ने देश को झुकने नहीं दिया। कोरोना काल में जब सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी, जीडीपी औंधे मुख पड़ी थी, तब खेती ही एकमात्र क्षेत्र था जिसने सकारात्मक वृद्धि कायम रखी और हर थाली तक भोजन पहुँचाया। यह प्रमाण है कि किसान कभी राष्ट्रविरोधी नहीं रहा, वह हमेशा देश का सेवा-धर्मी प्रहरी बना रहा है। जब जब देश संकट में रहा है, किसान ने ही उसे संभाला है। फिर भी विडंबना यह है कि वही किसान राजनीति और मीडिया में ‘अंदोलनजीवी’, ‘खालिस्तानी’ या ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दिया जाता है।
देश के किसान का सत्ता और उसकी क्रीतदासी मीडिया से सीधा सवाल है कि “जो किसान धरती को सोना बना दे, देश के हर मुख को निवाला दे उसके हिस्से में कांटे क्यों, तिरस्कार क्यों?”
एमएसपी ! अधूरा वादा, टूटी उम्मीद : किसान आंदोलन की प्रमुख मांग रही एमएसपी की कानूनी गारंटी। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें और 2014 के चुनावी वादे सब इसके समर्थन में थे। किंतु ग्यारह वर्षों के शासन और तीन बार के पूर्ण बहुमत के बावजूद यह कानून आज भी अधर में है। 2018 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इसे ‘अव्यावहारिक’ घोषित किया और कई समितियाँ बनाकर रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इस बीच खेती की लागत हर वर्ष बढ़ती रही और एमएसपी की दर लागत के मुकाबले आधी रफ्तार से ही चढ़ी। परिणामस्वरूप घाटा सीधा किसान की जेब में गया और किसानों की आत्महत्याओं की त्रासदी स्थायी हो गई।

राजनीति का स्मृतिलोप

आज सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिन नेताओं ने आंदोलनकारियों को राष्ट्रविरोधी कहकर अपमानित किया था, वही अब अंतरराष्ट्रीय दबाव, विशेषकर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों के कारण, किसानों को ‘राष्ट्रीय सम्मान’ बताने लगे हैं। अमेरिका 25 प्रतिशत तक शुल्क बढ़ाकर भारत के कृषि निर्यात पर चोट कर रहा है, तो सत्ता के लिए किसान अचानक आवश्यक और पूज्य हो जाते हैं। यही राजनीति की स्मृतिलोप बीमारी है, जो नीति को नहीं बल्कि सत्ता के हित को आधार बना लेती है। दूसरी और देश का किसान आज भी देश को विश्वास दिलाते हैं कि वह भारत के मुंह पर 25% टैरिफ का तमाचा मारने की बात करने वाले डोनाल्ड ट्रंप का हाथ मरोड़ के रख देंगे और यह साबित कर देंगे कि कोई भी देश या उनका बड़बोला नेता चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना हो 70% किसानों के देश भारत को आंखें नहीं दिखा सकता।इस अपवित्र टैरिफ दबाव के विरोध में तमाम अंतर्विरोधों के दरकिनार इस वक्त देश का हर किसान देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए देश तथा अपनी सरकार के साथ पूरी मजबूती के साथ खड़ा है।
*किसान महज वोट बैंक नहीं, देश की रीढ़ की हड्डी हैं किसान : सत्ता को समझना होगा कि, किसान लोकतंत्र में मात्र वोट बैंक नहीं है। वह इस देश का सबसे बड़ा राष्ट्रसेवक है। यदि सरकार सही मायनों में खेती पर 50% लाभांश सहित लागत मूल्य सुनिश्चित कर दे, तो मुफ्त वितरण की नीति, आत्महत्या की घटनाएँ और सब्सिडी का बोझ , तीनों की ज़रूरत स्वतः समाप्त हो जाएगी।
*आँकड़े बोलते हैं: * कि आज भी कृषि का योगदान जीडीपी में लगभग 18% है और यह 45% जनशक्ति को रोज़गार देता है।
लॉकडाउन में जब जीडीपी रिकॉर्ड 24% तक गिरी, तब भी खेती ने सकारात्मक वृद्धि बनाए रखी। इसके बावजूद एमएसपी कानून नहीं बना। सवाल उठता है: जिस क्षेत्र पर देश की दो तिहाई आबादी निर्भर है, उसकी सुरक्षा के लिए कानून बनाना कठिन क्यों है?

संसद की चुप्पी, लोकतंत्र की विडंबना : लालकिले से किसानों का नाम गिनाना आसान है, मगर उनकी मौतों पर संवेदना जाहिर करना सत्ता को भारी क्यों पड़ता है? क्या लोकतंत्र केवल वोट तक सीमित है? जिस खेत से देश की हर थाली को भोजन मिलता है, देश के हर नेता मंत्री का चुनाव जीतना संभव होता है, वही खेत जब न्याय मांगता है तो उसकी आवाज़ को दबा दिया जाता है।
अब समय साहस दिखाने का :
आज आवश्यकता है कि किसानों की पीड़ा को चुनावी मंच पर किए गए नारों से परे जाकर समझा जाए। प्रधानमंत्री और सरकार को यह साहस दिखाना चाहिए कि एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए। तभी ‘जय किसान’ महज़ एक नारा नहीं, बल्कि अन्नदाता का सशक्त गीत बन सकेगा।

किसान ही असली आत्मनिर्भरता

भारत यदि सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर होना चाहता है, तो उसे अपने किसान की गरिमा और अधिकार की रक्षा करनी होगी। जय जवान जय किसान केवल नारा नहीं बल्कि राष्ट्र की आत्मा है। यह आत्मा तभी जीवित रह सकती है जब किसान को उसका उचित मूल्य मिले, खेत समृद्ध हों और किसान ऋणी या आत्महत्या के लिए विवश न हो।
सवाल नीतियों का ही नहीं, नैतिकता का भी है। क्या यह राष्ट्र उस किसान को सम्मान देगा जिसने कभी देश को संकट में अकेला नहीं छोड़ा? या फिर उसे राजनीति की बलि चढ़ाता रहेगा? यही निर्णय भारत की दिशा और दशा तय करेगा।

समाधान की राह : किसानों के सम्मान और अधिकार की गारंटी

1-एमएसपी की कानूनी गारंटी : स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप “C2 + 50% लाभांश” के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित कर उसकी कानूनी गारंटी दी जाए। यह किसानों के लिए स्थायी सुरक्षा कवच बनेगा।
2- कृषि लागत पर नियंत्रण : डीज़ल, बीज, खाद और कृषि यंत्रों की कीमत पर नियमन करते हुए, किसानों की लागत घटाने हेतु प्रत्यक्ष सब्सिडी और सहकारी तंत्र मजबूत किया जाए।
3- भंडारण और विपणन व्यवस्था का विस्तार :प्रत्येक जिले में आधुनिक गोदाम, कोल्ड-स्टोरेज और मंडियों का जाल बिछाया जाए ताकि किसान अपनी उपज को मजबूरी में औने-पौने दाम पर बेचने के बजाय उचित समय और दाम पर बेच सके।
4- कृषि बीमा और ऋण-प्रबंधन सुधार : प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को पारदर्शी और प्रभावी बनाया जाए, प्रीमियम घटाकर सरल किया जाए। साथ ही किसानों के कर्ज़ को चक्रवृद्धि ब्याज मुक्त कर समयबद्ध राहत योजना बनाई जाए।
5- किसानों को नीति-निर्माण में भागीदारी :
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कृषि नीति निर्धारण समितियों में किसानों के प्रतिनिधियों को सीधा स्थान दिया जाए। इससे नीतियाँ खेत-खलिहान के वास्तविक अनुभव पर आधारित होंगी, न कि केवल नौकरशाही और कॉर्पोरेट दबावों पर।
अंत में… आज डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के आत्मस्वाभिमान को ही नहीं, देश के किसानों की गैरत को भी ललकारा है। भारत का हर किसान डोनाल्ड ट्रंप को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए हमेशा की तरह आज भी देश के साथ मजबूती से खड़ा है।
सौ बात की एक बात, भारत की संप्रभुता तथा आत्मसम्मान की रक्षा के लिए भारत का सशक्त और आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। और भारत तभी आत्मनिर्भर और सशक्त हो सकता है जब उसका अन्नदाता सुरक्षित, सम्मानित और समृद्ध हो। किसान को खलनायक बताने की राजनीति छोड़कर उसे वास्तविक नायक मानने का साहस दिखाना होगा। वही दिन होगा जब “जय किसान” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का सजीव प्रमाण बनेगा। और वह दिन जितनी जल्दी आएगा देश का उतना ही ज्यादा भला होगा‌।

“लेखक :  ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’ के राष्ट्रीय संयोजक हैं।

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