बस्तर केंद्रित; चुनाव श्रंखला (आलेख – 8)
lok sabha election 2024 : बस्तर के चुनावों में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का प्रभाव वर्ष 1971 के चुनावों के बाद से समाप्त माना जा सकता है, यही कारण है कि इसके बाद से भारत की राष्ट्रीय पार्टियां अथवा राजनीति परिणामों पर हावी रही थी। भारतीय राजनीति के किसी भी फलक में आपको निर्दलीय उमीदवारों का ऐसा बोलबाला नहीं दिखाई पड़ेगा जैसा कि बस्तर में हम वर्ष 1971 के चुनावों तक देखते हैं। निर्दलीय उमीदवारों की जीत का अर्थ आज यह होता है कि वह धनबल से सम्पन्न अथवा नामचीन प्रभावशाली व्यक्ति होना चाहिये, लेकिन बस्तर में जो निर्दलीय सत्तर के दशक तक विजय का परचल लहराते हुए लोकसभा और विधानससभा तक पहुँच रहे थे, वे सामान्य जन थे। देश का सामान्य आदिवासी अपने राजा के समर्थन से लोकतंत्र के मंदिर में सीधे पहुच रहा था और राष्ट्रीय पार्टियाँ अपनी जमानते जब्त करावा रही थीं,तब विषय विवेच्य हो ही जाता है।
भारत का पहला चुनाव और विजेता थे निर्दलीय उम्मीदवार मुचाकी कोसा जिन्हे रिकॉर्ड 83.05 प्रतिशत (कुल 1,77,588 मत) वोट प्राप्त हुए जबकि कॉंग्रेस के प्रत्याशी सुरती क्रिसटैय्या को मात्र 16.95 प्रतिशत (कुल 36,257 मत) वोटों से संतोष करना पड़ा था।महाराजा समर्थित इस आम आदिवासी प्रत्याशी ने ऐसा इतिहास रचा जिसे आज भी बस्तर में तोड़ा नहीं जा सका है। यह ठीक है कि अगले ही चुनावों (वर्ष 1957) में कॉंग्रेस के उमीदावर सुरती क्रिसटैय्या (77.28%) को बड़ी जीत मिली लेकिन वे उस मील के पत्थर को नहीं छू सके जो पहले चुनावों (वर्ष 1952) में मुचाकी कोसा (83.05%) स्थापित कर गए थे। दोनों के बीच का यह अंतर 5.77% का रहा था। वर्ष 1957 में हुए पहले विधान सभा चुनावों में जबकि वृहद बस्तर जिला के अंतर्गत सात सीटें आती थी इनमें भी जगदलपुर तथा बीजापुर) में निर्दलीय प्रत्याशी ही जीते यद्यपि शेष पाँच स्थानों (कांकेर, केशकाल, नारायणपुर, चित्रकोट तथा दंतेवाड़ा) पर से कॉंग्रेस के प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे थे। इस वर्ष के विधासभा चुनावों की एक विशेषता यह भी थी कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने स्वयं निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था और कॉंग्रेस के प्रत्याशी दुरहा प्रसाद को भारी मतों से पराजित किया था।
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जिस सुरती क्रिस्टैया ने वर्ष 1957 के चुनाव में 77.28% मत हासिल कर जीत प्राप्त की थी, वे वर्ष 1962 का चुनाव बुरी तरह हारे, उन्हें केवल 12.82% मत ही मिल सके और वे चुनावी समर में तीसरे स्थान पर रहे। इन चुनावों में कॉंग्रेस का मुकाबला तीन अन्य निर्दलीय प्रत्याशी कर रहे थे। निर्दलीय लखमू भवानी को 87557 (46.66%) मत प्राप्त हुए, निर्दलीय बोध दादा को 61348 (32.69%) मत प्राप्त हुए, कॉंग्रेस के सुरती क्रिस्टैया को 24057 (12.82%) मत प्राप्त हुए तथा निर्दलीय सुधू लखन को 14694 (7.83%) मत प्राप्त हुए। इस तरह एक बड़ी जीत निर्दलीय प्रत्याशी लखमू भवानी ने हासिल की। निर्दलियों ने वर्ष 1962 के चुनावों में सर्वत्र अपना डंका बजाया था। इन विधानसभा चुनावों मे बीजापुर को छोड सर्वत्र महाराजा पार्टी के निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। इस विधानसभा चुनाव का एक और रोचक पक्ष है। कहते हैं कि राजनैतिक साजिश के तहत तत्कालीन जगदलपुर सीट को भी आरक्षित घोषित कर दिया गया जिससे कि प्रवीर बस्तर में स्वयं कहीं से भी चुनाव न लड़ सकें। उन्होंने कांकेर से पर्चा भरा और हार गये। कांकेर से वहाँ की रियासतकाल के भूतपूर्व महाराजा भानुप्रताप देव विजयी रहे थे जोकि स्वयं भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे थे।
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वर्ष 1966 में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या के बाद हुए आम जनमानस में जन आक्रोश था साफ साफ दिखाई पडा। कॉंग्रेस प्रत्याशी काड़ी बोंगा को केवल 19914 मत (10.31%) प्राप्त हुए। चुनाव में दुर्दशा का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उस समय की सबसे प्रभावशाली राजनैतिक पार्टी चौथे स्थान पर रही थी। इन चुनावों में विजेता थे निर्दलीय प्रत्याशी झाड़ू सुंदरलाल जिन्हे 53578 मत (27.87%) प्राप्त हुए। स्वतंत्रता पश्चात यह पहली बार था जबकि आठ प्रत्याशी मुकाबले में थे। यदि सभी निर्दलियों का मत जोड़ दिया जाये तो यह संख्या 106155 (55%) हो जाती है। यह भी संज्ञान में लेना होगा कि इसी वर्ष विधान सभा के चुनावों में भी कांकेर, चित्रकोट और कोण्टा सीत छोड़ कर शेष सभी स्थानों पर कॉंग्रेस की पराजय हुई थी। वर्ष 1971 का चुनाव भी प्रवीर फैक्टर के साथ ही लडा गया था और इसके लिए प्रवीर के अवतार के रूप में स्वयं को लोकप्रिय करा चुके बाबा बिहारी दास का सहायोग लिया गया। लोकसभा चुनावों में तो कॉंग्रेस ने अपना प्रत्याशी ही खड़ा नहीं किया इसलिए मुकाबला निर्दलीय बनाम निर्दलीय हो कर रह गया। दस प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा जिसमें से नौ निर्दलीय थे र एकमेव जनसंघ ने प्रतिभागिता की थी। निर्दलीय प्रत्याशी लंबोधर बलिहार (42207 मत) ने इन चुनावों में अपने निकटतम निर्दलीय प्रत्याशी पीलू राम (34713 मत) को पराजित किया। यह स्थिति विधानसभा के चुनावों में परिलक्षित नहीं हुई जहाँ बाबा बिहारी दास ने महाराजा प्रवीर के नाम के प्रभाव में प्रचार किया जिसका परिणाम हुआ कि निर्दलियों को एक भी सीट पर विजय हासिल नहीं हुई। लोकसभा में आखिरी बार निर्दलीय प्रत्याशी महेंद्र कर्मा ने लोकसभा चुनावों में वर्ष 1966 में जीत हासिल की थी। विधानसभा चुनावों की बात की जाये तो वर्ष 1980 के विधानसभा चुनावों में कांकेर और कोण्टा से निर्दलीय, वर्ष 1990 के चुनाव में भानुप्रतापपुर से निर्दलीय प्रत्याशियों ने अपनी धमाक दिखाई लेकिन अब तक बस्तर के लोकसभा और विधासभा दोनों ही चुनावों में कॉंग्रेस बनाम भाजपा का वातावरण बना गया था।