दुर्ग बालोद राजमार्ग पर दुर्ग से लगभग 12 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है-अंडा। कभी यह गॉंव कृषि कार्य के कारण अत्यंत समृद्ध ग्रामों में गिना जाता था। राजनीतिक रूप से भी यह गाँव एक विधानसभा क्षेत्र के रूप में विख्यात रहा। किंतु इस अंडा ग्राम का रिश्ता देश के शीर्षस्थ क्रांतिकारी से भी है! इस नाते इसका अपना एक अलग महत्व भी है।
अधिकांश लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि लाहौर में जन्मे क्रांतिकारी सुखदेव राज ने आजादी के बाद अंदर ग्राम में कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए एक आश्रम खोल कर अपनी जिंदगी का अंतिम दशक बिताया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह वही सुखदेव राज है जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों की योजनायें बनाई थी। वे पकड़े गये और क्रूर अंग्रेजी हुकूमत ने क्रांतिकारी सुखदेव राज को तीन-तीन वर्ष के दो सश्रम कारावास की सजा दी थी। चंद्रशेखर आजाद के साथ रहने वाले सुखदेव राज लगभग 1500 दिनों के कठोर सश्रम कारावास में रहे। आजादी के बाद भी देश सेवा का जुनून उन पर था। आजादी के बाद उनके जीवन का लक्ष्य समाज सेवा हो गया। वे आचार्य विनोबा भावे की के सम्पर्क में आए और यहीं से इस क्रांतिकारी हृदय की नई यात्रा शुरू हुई। यात्रा का अंतिम और महत पड़ाव रहा अंडा ग्राम । यह दुर्लभ संयोग है कि लाहौर में जन्मे सुखदेव राज ने अपने जीवन का अंतिम दशक छत्तीसगढ़ के अंडा ग्राम में एक आश्रम खोलकर कुष्ठ रोगियों के सेवा में बिताये। वे यहाँ 1963 से 1973 तक रहे। किंतु अंडा गॉंव ही नहीं बल्कि दुर्ग जिले के लोग भी सुखदेव राज के जीवन से जुड़े इस तथ्य या अन्य योगदान को नहीं जानते। उनके छत्तीसगढ़ प्रवास के बारे में दो लोगों से सुना था। एक तो पिताजी स्मृतिशेष गणेश शंकर शर्मा जी व दूसरे श्री कनक तिवारी जी।
आज 15 अगस्त 2025 को मन में विचार प्रस्फुटित हुआ कि इतने बड़े क्रांतिकारी के स्मृतिस्थल पर जाकर प्रणाम करना चाहिये। मैंने स्वयं बाइक से जाने का मन बना ही।लिया था पर जगह मुझे नहीं मालूम थी। मेरे प्रोफेसर मित्र शुभम चंद्राकर अंडा से ही आते है। हम दोनों साथ हो लिए और अपनी अपनी बाइक से पहुंचे क्रांतिकारी सुखदेव राज स्मृति स्मारक। स्थल खोजने में ज्यादा दिक्कत हुई नहीं क्योंकि यह स्थल सड़क के किनारे ही है। हाँ आश्चर्य जरूर हुआ क्योंकि सड़क विभाजक पर स्मारक का बोर्ड तो है पर स्मारक वैसा नहीं जैसा मेरे मस्तिष्क में था। स्मारक की जगह एक फैक्ट्री है। फैक्टरी के अहाते में स्मृतिशेष की मूर्ति जिसके ऊपर का स्लैब सफाई से काट दिया है ताकि पुराण स्लैब गिरकर मूर्ति को नुकसान न पहुंचा दे। जिसने भी ऐसा किया ठीक किया।
श्री सुखदेव राज के निधन के पश्च्यात क्रांतिकारी सुखदेव राज स्मृति समारोह समिति ने उनका स्मारक बना दिया 1976 में। उनका आश्रम तो अब नहीं है उसकी जगह पर एक उद्योग लगा हुआ है। समिति द्वारा स्थापित संगमरमर की बहुत ही सुंदर प्रतिमा अभी अपनी पूर्ण कांति के साथ स्थापित है। मूर्ति के आधार संरचना पर लगी शिला पट्टिकाएं अनेक जानकारियों से भरी हैं। एक पट्टिका बताती है कि समिति के प्रयास से स्थापित इस सुंदर प्रतिमा का अनावरण 8 दिसम्बर 1976 को तत्कालीन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल के करकमलों से हुआ था। तब से अब तक यह प्रतिमा सुखदेव राज की अंडा में उपस्थिति को रेखंकित करती आ रही है। पर पूरे दुर्ग जिले के शायद दस बीस लोग ही यह जानते है। मूर्ति से कुछ किलोमीटर दूर स्कूल के लोग नहीं जानते, मूर्ति के 10 किलोमीटर के दायरे में स्थित चार चार महाविद्यालयों में लिखने पढ़ने वाले भी नहीं जानते कि सुखदेव राज नाम का कोई क्रांतिकारी व्यक्तित्व था भी और यह भी नहीं जानते कि सुखदेव राज अंडा ग्राम में आकर रहे थे। यह कैसा दुखद पक्ष है । आज 15 अगस्त 2025 को अपने महाविद्यालय में मैंने अपने भाषण के दौरान सुखदेव राज और अंडा से उनके संबंध का रहस्य उद्घाटन किया तो बहुत से लोग कौतुक भरी नजरों से मुझे देखने लगे।यह उनके लिए नया था। मैं कुछ लोगों के शक के दायरे में भी रहा होऊंगा पर अधिकांश को मुझपर भरोसा था ही। मेरी एक जानकारी ने वहां उपस्थित सैकड़ो लोगों के मन में सुखदेव राज और अंडा ग्राम के प्रति जिज्ञासा के बीज बो दिए परिणाम यह हुआ की मंच से ही घोषणा की गई कि महाविद्यालय से हम सब एक दिन वहां जाकर अपने श्रद्धा सुमन जरूर अर्पित करेंगे।
सोचिए हम जैसे लिखने पढ़ने वाले लोगों के द्वारा एक तथ्य को संदर्भित करने से नई पीढ़ी इतना जग सकती है तो फिर क्यों ना हम यह काम निरंतर जारी रखें ताकि धुंधलके में खोये हुए ऐतिहासिक गौरव नई पीढ़ी तक पहुँचते रहे।