Dev Anand की फ़िल्म
‘एक के बाद एक’
देवानंद साहब मेरे बचपन के उन किरदारों में हैं जिन्हें मैंने सबसे पहले भंडारा में सड़क सिनेमा में देखा । मोहल्ले के बच्चे आकर बताते थे “चल चल, शरद जल्दी से चल पिच्चर दिखाने वाले आ रहे हैं ।” हम लोग अपने घर से एक पुरानी बोरी लेते और बालपुरी नवदुर्गा मंदिर के सामने वाली सड़क पर बिछाकर बैठ जाते।
थोड़ी देर मे एक गाड़ी आती जिला पंचायत की, उसमे से एक आदमी उतरता, एक बड़ी सी टीन की पेटी लिए, उसके पास होती एक मशीन यानी प्रोजेक्टर और एक गोल गोल लपेटा हुआ पर्दा । मोहल्ले वालों की मदद से तुरत फुरत सड़क पर पर्दा तान दिया जाता और किसी घर से बिजली का तार खींचकर कनैक्शन लिया जाता और एक टेबल पर प्रोजेक्टर जमा दिया आता । पीले बल्ब की रौशनी मे मशीन पर रील चढ़ाई जाती ।
अचानक कोई आवाज़ लगाता “पिच्चर चालू हो रही है रे …” सब लोग खामोश हो जाते फिर पर्दे पर ब्लैक एंड व्हाइट एक चित्र प्रकट होता … राज कला प्रेसेंट्स …. ‘एक के बाद एक’ और कलाकारों संगीतकार आदि के नाम के देवानंद (Dev Anand) ,शारदा,राधाकिशन, प्रभुदयाल,सचिन देव बर्मन, मजरूह सुल्तानपुरी ……
अगला दृश्य कॉलेज की एक क्लास का है । प्रोफेसर क्लास ले रहे हैं…”क्या आप जानते हैं सन इक्यावन मे देश की आबादी कितनी थी थ्री फिफ्टी सिक्स पॉइंट एटी एट , सन चौवन मे थ्री सेवेंटी सेवेन … क्या आपमे से ओ…कोई बता सकता है चौवन मे हमारे देश मे अनाज कितना होता था ?” प्रोफेसर एक एक स्टूडेंट से पूछते है, “यू मिस्टर पाठक, मिस्टर संत अँड यू मथुरादास ?” लेकिन कोई जवाब नहीं देता ।
अचानक पीछे की बेंच से देवानन्द यानी प्रकाश खड़े होते है, गर्दन थोड़ी झुकी हुई है , मुँह मे फाउंटेन पेन दबा हुआ है, वे अपने अंदाज़ मे कहते हैं “मैं बता सकता हूँ सर, … सिक्स्टी सेवेन पॉइंट सेवेंटी टू मिलियन टन । ”
देवानन्द से यह मेरा पहला परिचय था । अगले दृश्य मे देवानन्द दिखाई देते हैं नायिका को स्टेशन से घर आने के मार्ग पर छेड़ते हुए । देवानन्द गा रहे हैं … ठुमक ठुमक चली रे हाय चली रे तू किधर , इस रोमांटिक गाने मे भी कॉमेडी थी जिस पर हम बच्चे खूब हँसते थे । अंताक्षरी में आज भी जब ‘ठ’ पर लोग अटक जाते हैं मैं यही गाना गाता हूं।
फिर फ़िल्म के अगले दृश्यों मे बच्चों के साथ खेलते हुए देवानन्द दिखाई देते हैं … चली ये फौज हमारी रे चल चलम चल चललम चल, छिड़ी लड़ाई भारी रे चल चलम चल चललम चल बच्चे और उनके साथ ढेर सारे फौजी बंदर भालू हिरण वाले खिलौने ।
ज्यादा आबादी से क्या क्या नुकसान होता है
‘एक के बाद एक ‘ यह फिल्म सन साठ मे आई थी और सत्तर के दशक तक परिवार नियोजन विभाग की ओर से दिखाई जाती रही । फिल्म मे यह बताने की कोशिश की गई थी कि ज्यादा आबादी से क्या क्या नुकसान होता है ।
आगे फिल्म गंभीर हो जाती है देवानन्द के बड़े भाई के नौ बच्चे होते हैं और आर्थिक अभाव के कारण वे उनका पालन पोषण नहीं कर पाते और अंततः उन्हे आत्महत्या करनी पड़ती है। बच्चों की माँ तो अंतिम प्रसव के समय ही मर जाती है । अनाथ बच्चों से सनातन धर्म के एक मठाधीश भीख भी मँगवाते हैं ।
जब भी देवानंद को याद करता हूं तो सबसे पहले उनका यही चेहरा याद आता है। मैंने देवानन्द को इसी रूप मे पहली बार देखा । यह फिल्म भी इतनी बार देखी कि इसका एक एक दृश्य याद है जाने कितने दृश्यों मे तो हम बच्चे फूट फूट कर रो देते थे।
आज देवानन्द साहब को जाने कितने आयामों मे याद किया जा रहा है लेकिन मेरे लिए मेरे बचपन के जेहन मे शामिल देव साहब का वही चेहरा आज भी मौजूद है , जब भाई के मरने के बाद और समाज से ठुकराए जाने के बाद देव साहब सारे बच्चों को लेकर जाने लगते हैं, तब एक बच्चा पूछता है ” हम कहाँ जाएंगे चाचा ?”
तब देव चाचा कहते हैं “कहीं भी जाएंगे बेटा… दूर बहुत दूर… जहां के लोग ऐसे नहीं होंगे …. जहां बच्चों की मोहब्बत का सही मतलब समझा जाता होगा । ”
मुझे याद नहीं पूरी फिल्म मे मार्मिक दृश्यों को देखते हुए मैं कितनी बार रोया , लेकिन यह सत्य है कि मेरे मन मे प्रेम, करुणा और संवेदना के बीज इसी फिल्म ने बोये ।
आज 26 सितंबर उनके सौंवे जन्मदिन पर यही कहूंगा…आई लव यू देव चाचा ॥
शरद कोकास
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