राजनांदगांव-रायगढ़ के साथ जिन विभूतियों का नाम जुड़ा है, उनमें डा. बलदेव प्रसाद मिश्र हैं। मिश्र जी के विपुल लेखन में एक खास ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ है। पुस्तक का पहला संस्करण संभवतः 1955 में आया। छत्तीसगढ़ की अन्य विभूतियों और कृतियों की तरह, इस पुस्तक पर ढेरों बातें पढ़ने-जानने को मिलती रहीं थीं, लेकिन पुस्तक देखने का अवसर नहीं मिला था। यह पुस्तक चौथी बार हिन्द प्रकाशन (मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे, गांधीवादी चित्रकांत जायसवाल जी के परिवार का जूनी लाइन, बिलासपुर स्थित छापाखाना) से 1960 में छपी, जिसकी प्रति देखने को मिली, तब इस कृति से मेरा वास्तविक परिचय हुआ। मिश्र जी की पूरी पुस्तक भी यही एक मैंने पढ़ी है। अन्यथा उन पर संस्मरण, जीवनी, टीका-टिप्पणी, जै-जैकार तो देखने को मिल जाता है, उनका लिखा मूलतः सहज उपलब्ध नहीं होता। 1928 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जीव विज्ञान‘ के लिए पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिक्रिया थी- ‘पुस्तक के अवलोकन से मुझे अनेक तत्व रत्नों की प्राप्ति हो गई। … आप धन्य हैं।‘ इसी प्रकार 1938-39 के उनके डी.लिट. शोध-प्रबंध ‘तुलसी दर्शन‘ के लिए परीक्षक पं. रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘महान अध्यवसाय और व्यापक अध्ययन का परिणाम‘ बताया था। पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘तुलसी दर्शन‘ की प्रति पा कर लिखा कि ‘आपने मुझे संजीवनी का दान दे डाला।‘
पिछले दिनों चर्चाओं के दौरान यह अनुमान हुआ कि मिश्र जी को जानने वाले, इस पुस्तक के नाम से तो परिचित हैं, उनकी कृतियों की सूची में इसे शामिल करते हैं, लेकिन पुस्तक देखा-पढ़ा नहीं है, इसलिए आवश्यक माना कि इस पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास करूं। यह भी ध्यान में आया कि राजनांदगांव की त्रिवेणी के बख्शी जी और मुक्तिबोध जी का लगभग संपूर्ण लेखन, रचनावली-समग्र के माध्यम से प्रकाशित हो चुका है, मिश्र जी का महत्व उनसे कम नहीं, इसके बावजूद उनका समग्र, हम उनके उत्तराधिकारी, अभी तक नहीं तैयार कर पाए हैं, उनका साहित्य राजनांदगांव की त्रिवेणी में अब भी सरस्वती की तरह लुप्त जैसा ही है, बहरहाल …
‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ के 128 पृष्ठों में कुल 25 शीर्षक हैं, जिनमें 24 लोक कथाएं हैं, तथा पचीसवां लेख परिचय (इतिहास) शीर्षक से है। ‘इतिहास‘ की ऐसी रोचक प्रस्तुति, जिसमें उत्तर छत्तीसगढ़ का रामगिरि तो दक्षिण छत्तीसगढ़ का दन्तेवाड़ा भी शामिल है, अनूठी है। अनूठी इस अर्थ में कि अक्सर छत्तीसगढ़ की बात करते हुए राज्य का उत्तरी हिस्सा, सरगुजा और दक्षिणी हिस्सा, बस्तर पूरी तरह छूट जाता है। अधिकतर मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ को ही समग्र मान लिया जाता है। साथ ही स्थानीय मान्यताओं, दंतकथाओं के साथ इतिहास को प्रस्तुत करने की शैली रायबहादुर हीरालाल और लोचन प्रसाद पांडेय की थी उसी तरह वह यहां भी पूरे सम्मान सहित दर्ज है। साथ ही इसमें किसी सजग इतिहासकार की तरह तथ्यों और विश्वास-मान्यता को स्पष्ट रखा गया है इसलिए जहां आवश्यक हो, ‘बताया जाता है‘, ‘कहा जाता है‘, ‘इतिहास प्रसिद्ध है‘, ‘स्पष्ट संकेत‘, ‘रहा होगा‘, ‘जान पड़ता है‘ जैसा प्रयोग है।
पुस्तक के बारे में बताया जाता है कि यह स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल रही है। पाठ के रूप में ऐसी सामग्री हो तो विद्यार्थी-पाठक सहज ही आत्मीय रूप से अपने राज्य से जुड़ जाता है और संस्कारित होता है। मेरा मानना है कि यही छत्तीसगढ़ से परिचित होने का सही तरीका है। आगे सीधे परिचित होने के लिए पुस्तक के कुछ अंश-
दो शब्द
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विभिन्न संस्कृतियों का जैसा मजेदार संगम छत्तीसगढ़ में देखने को मिल सकता है वैसा भारत के अन्य स्थल में बहुत कम मिलता है।