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सतत् छत्तीसगढ़

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‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का परिचय

राहुल कुमार सिंह

by satat chhattisgarh
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Introduction to 'Chhattisgarh Introduction'

राजनांदगांव-रायगढ़ के साथ जिन विभूतियों का नाम जुड़ा है, उनमें डा. बलदेव प्रसाद मिश्र हैं। मिश्र जी के विपुल लेखन में एक खास ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ है। पुस्तक का पहला संस्करण संभवतः 1955 में आया। छत्तीसगढ़ की अन्य विभूतियों और कृतियों की तरह, इस पुस्तक पर ढेरों बातें पढ़ने-जानने को मिलती रहीं थीं, लेकिन पुस्तक देखने का अवसर नहीं मिला था। यह पुस्तक चौथी बार हिन्द प्रकाशन (मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे, गांधीवादी चित्रकांत जायसवाल जी के परिवार का जूनी लाइन, बिलासपुर स्थित छापाखाना) से 1960 में छपी, जिसकी प्रति देखने को मिली, तब इस कृति से मेरा वास्तविक परिचय हुआ। मिश्र जी की पूरी पुस्तक भी यही एक मैंने पढ़ी है। अन्यथा उन पर संस्मरण, जीवनी, टीका-टिप्पणी, जै-जैकार तो देखने को मिल जाता है, उनका लिखा मूलतः सहज उपलब्ध नहीं होता। 1928 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जीव विज्ञान‘ के लिए पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिक्रिया थी- ‘पुस्तक के अवलोकन से मुझे अनेक तत्व रत्नों की प्राप्ति हो गई। … आप धन्य हैं।‘ इसी प्रकार 1938-39 के उनके डी.लिट. शोध-प्रबंध ‘तुलसी दर्शन‘ के लिए परीक्षक पं. रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘महान अध्यवसाय और व्यापक अध्ययन का परिणाम‘ बताया था। पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘तुलसी दर्शन‘ की प्रति पा कर लिखा कि ‘आपने मुझे संजीवनी का दान दे डाला।‘

पिछले दिनों चर्चाओं के दौरान यह अनुमान हुआ कि मिश्र जी को जानने वाले, इस पुस्तक के नाम से तो परिचित हैं, उनकी कृतियों की सूची में इसे शामिल करते हैं, लेकिन पुस्तक देखा-पढ़ा नहीं है, इसलिए आवश्यक माना कि इस पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास करूं। यह भी ध्यान में आया कि राजनांदगांव की त्रिवेणी के बख्शी जी और मुक्तिबोध जी का लगभग संपूर्ण लेखन, रचनावली-समग्र के माध्यम से प्रकाशित हो चुका है, मिश्र जी का महत्व उनसे कम नहीं, इसके बावजूद उनका समग्र, हम उनके उत्तराधिकारी, अभी तक नहीं तैयार कर पाए हैं, उनका साहित्य राजनांदगांव की त्रिवेणी में अब भी सरस्वती की तरह लुप्त जैसा ही है, बहरहाल …

‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ के 128 पृष्ठों में कुल 25 शीर्षक हैं, जिनमें 24 लोक कथाएं हैं, तथा पचीसवां लेख परिचय (इतिहास) शीर्षक से है। ‘इतिहास‘ की ऐसी रोचक प्रस्तुति, जिसमें उत्तर छत्तीसगढ़ का रामगिरि तो दक्षिण छत्तीसगढ़ का दन्तेवाड़ा भी शामिल है, अनूठी है। अनूठी इस अर्थ में कि अक्सर छत्तीसगढ़ की बात करते हुए राज्य का उत्तरी हिस्सा, सरगुजा और दक्षिणी हिस्सा, बस्तर पूरी तरह छूट जाता है। अधिकतर मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ को ही समग्र मान लिया जाता है। साथ ही स्थानीय मान्यताओं, दंतकथाओं के साथ इतिहास को प्रस्तुत करने की शैली रायबहादुर हीरालाल और लोचन प्रसाद पांडेय की थी उसी तरह वह यहां भी पूरे सम्मान सहित दर्ज है। साथ ही इसमें किसी सजग इतिहासकार की तरह तथ्यों और विश्वास-मान्यता को स्पष्ट रखा गया है इसलिए जहां आवश्यक हो, ‘बताया जाता है‘, ‘कहा जाता है‘, ‘इतिहास प्रसिद्ध है‘, ‘स्पष्ट संकेत‘, ‘रहा होगा‘, ‘जान पड़ता है‘ जैसा प्रयोग है।

पुस्तक के बारे में बताया जाता है कि यह स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल रही है। पाठ के रूप में ऐसी सामग्री हो तो विद्यार्थी-पाठक सहज ही आत्मीय रूप से अपने राज्य से जुड़ जाता है और संस्कारित होता है। मेरा मानना है कि यही छत्तीसगढ़ से परिचित होने का सही तरीका है। आगे सीधे परिचित होने के लिए पुस्तक के कुछ अंश-

Introduction to 'Chhattisgarh Introduction'

दो शब्द

इस ‘परिचय‘ का उद्देश्य है छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों को अपने अतीत की उज्वलता के प्रति उत्साहित बनाना और अपने वर्तमान के प्रति व्यापक राष्ट्रीयतायुक्त देखना। इसकी कहानियां विविध जिलों के हिन्दी तथा अंग्रेजी ‘गजेटियरों और सुनी सुनाई किम्वदन्तियों के आधार पर पल्लवित की गई हैं। मनोरंजन के साथ ही उपर्युक्त उद्देश्य को ध्यान में रख कर ही ये लिखी गई हैं। इनके शीर्षक प्रायः स्थानपरक ही हैं और इन कहानियों में छत्तीसगढ़ जिलों का समावेश हो जाता है आशा है छत्तीसगढ़ के बाहर भी इन रचनाओं का स्वागत होगा। ।
-बलदेव प्रसाद मिश्र

विषय सूची

१-सिंहनपुर (रायगढ़), २-सिहावा, ३-रतनपुर (१) ४-रामगिरि (सुरगुजा), ५-विमलामाता (डोंगरगढ़), ६-रतनपुर (२), ७-शिवरीनारायण, ८-राजिम, ९-दुर्ग, १०-बनबरद, ११-देव बलौदा, १२-पाटन, १३-दन्तेवाड़ा, १४-खलारी, १५-माली घोड़ी, १६-गुंडरदेही, १७-विंद्रा नवागढ़, १८-उपरौड़ा, १९-सोरर, २०-सक्ती, २१-शिवनाथ नदी, २२-अम्बागढ़ चौकी, २३-ओड़ार बांध, २४-भंडार, २५-परिचय (इतिहास)
इसी विंध्याचल के समीप भारत का केन्द्र बनकर उसके मध्य में अपना ‘मध्यप्रदेश‘ बसा हुआ है। इसी का बहुत सा भाग पहिले दण्डकारण्य के नाम से विख्यात था जो रामायण में प्रसिद्ध है। इस अरण्य का पूर्वी भाग पुराण-प्रसिद्ध नर्मदा नदी से और पश्चिमी भाग चित्रोत्पला गंगा (महानदी) से प्रभावित है। इन दोनों नदियों के किनारे अनेक ऋषि मुनि रह चुके हैं। नर्मदा किनारे का भेड़ाघाट भृगु ऋषि का आश्रम कहा जाता है जिनके वंश में परशुरामजी हुए। कार्तवीर्य सहस्रार्जुन की लीला भूमि भी नर्मदा के किनारे ही मण्डला या माहिष्मती के आसपास बताई जाती है। लङ्का का राजा रावण भी इसी क्षेत्र के चक्कर लगाया करता था और उसने इस ओर अपने सैनिक आदि नियुक्त कर रखे थे यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। नर्मदा और महानदी के आसपास की कई अनार्य जातियाँ अब तक अपने को रावणवंशी कहती हैं। महानदी के उद्गम के पास शृङ्गी ऋषि, अंगिरा ऋषि, मुचकुन्द आदि के आश्रम बताये जाते हैं। बस्तर के समीप अब भी धर्मशाला का स्थान बताया जाता है जहाँ, भगवान राम ने विश्राम किया था और जहाँ से सीता हरण हुआ था। बिलासपुर का शवरी नारायण स्थल इस बात का स्पष्ट संकेत करता है कि राम की शवरी से भेंट वहाँ कहीं हुई होगी। खरोद खरदूषण का स्थान है। लवन और महासमुन्द उस खारे सागर की याद दिलाते हैं जो भगवान राम के समय इधर रहा होगा। वन्य आदि निवासियों के गीतों में रावण की गाथा सुनकर और खरौद, लवन, शवरी नारायण सरीखे स्थान देखकर रायबहादुर हीरालाल सरीखे विद्वान तो यहाँ तक मान चुके हैं कि रावण भी नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक पहाड़ के आस-पास कहीं रही होगी।
दण्डकारण्य का यह इलाका दक्षिण कोसल कहाता था। कवि कालिदास ने, जो आज लगभग दो हजार साल पहिले हो चुके हैं, अयोध्या के राज को उत्तर कोसल लिखा है। ‘उत्तर कोसल‘ शब्द ही बताता है कि उस समय ‘दक्षिण कोसल‘ नाम भी जरूर चलता होगा। इसका ‘महाकोसल‘ नाम कब से और किसके कारण चल पड़ा इसका कोई पक्का पता नहीं। जान पड़ता है कि कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन के वंशज चेदि हैहयों ने जिनका कि इस ओर लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक राज्य रहा, इसकी महत्ता बढ़ाने के लिये इसे महाकोसल कहना प्रारम्भ कर दिया हो-ठीक उसी तरह जैसे नदी का नाम महानदी हो गया, छोटे इलाके का नाम महासमुन्द हो गया, आराध्या देवी का नाम महामाया हो गया और राजाभों का नाम भी ‘महाशिवगुप्त‘ आदि हो गया। इस दक्षिण कोसल अथवा महाकोसल का विशेष भाग इस समय छत्तीसगढ़ कहाता है। वास्तव में छत्तीसगढ़ की बोली भी उत्तर कोसल की अवधी से विशेष मेल खाती है और यही नर्मदा तथा महानदी दोनों के उद्गम हैं। यहाँ का क्षेत्रफल भी बहुत बड़ा है और प्राचीन चिन्ह तथा सांस्कृतिक समन्वय के उदाहरण भी महत्वपूर्ण हैं। महाकोसल का शेष अंश है बुन्देल खन्ड तथा मालवा का कुछ कुछ भाग।
विभिन्न संस्कृतियों का जैसा मजेदार संगम छत्तीसगढ़ में देखने को मिल सकता है वैसा भारत के अन्य स्थल में बहुत कम मिलता है।
शरीरश्रम और स्वच्छता के विषय में तो उनके नियम अनुकरणीय हैं। सामाजिक नियमों के सम्बन्धों में उनकी सादगी कई दृष्टियों से सुग्राह्य है। उनका सामाजिक संगठन भी देखने और सीखने की वस्तु है। जिस प्रांत में साहित्य-वाचस्पति लोचन प्रसाद पांडेय और साहित्य वाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के समान महानुभाच विद्यमान हों उसकी साक्षरता के विषय में अब कहना ही क्या है? यहाँ के नर रत्नों ने न केवल भारत में वरन् विदेशों में भी नाम किया है और नाम करते जा रहे हैं अतः हम सभी दृष्टियों से कह सकते हैं कि जिस प्रकार छत्तीसगढ़ का अतीत उज्ज्वल रहा है उसी प्रकार उसका भविष्य भी उज्ज्वल होकर रहेगा। अतीत के समान ही नहीं वरन् उससे बहुत बढ़कर।
प्रसंगवश स्मरण कि राजनांदगांव जिले के निर्माता के रूप में किशोरी लाल शुक्ल का नाम आता है। किंतु राजनांदगांव जिला निर्माण समिति के पदाधिकारियों की 1952 की सूची में खैरागढ़ की श्रीमती रानी पद्मावती देवी का नाम दूसरे क्रम पर और डा. बलदेव प्रसाद मिश्र का नाम सर्वोपरि है। एक अन्य तथ्य कि राजनांदगांव जिले की मांग किस तार्किक ढंग से की गई थी, (स्पष्ट अनुमान होता है कि मजमून भी मिश्र जी ने ही तैयार किया होगा।) कि बस्तर और कांकेर स्टेट को मिलाकर बस्तर जिला बनाया गया है, सरगुजा, कोरिया और चांगभखार को मिलाकर सरगुजा जिला तथा रायगढ़, सारंगढ़, सक्ती(?), उदयपुर और जशपुर को मिला कर रायगढ़ जिला बनाया गया है। इसी प्रकार नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान और कवर्धा (शिवनाथ स्टेट्स) को मिलाकर राजनांदगांव को जिला मुख्यालय घोषित किया जाना चाहिए।
Introduction to 'Chhattisgarh Introduction'

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