ऑस्ट्रेलिया के नई साउथ वेल्स की राजधानी सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का सफल आयोजन दो मार्च को संपन्न हुआ | इस वर्ष विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पच्चीसवी वर्षगाँठ को मनाया गया |
राजनांदगांव के युवा कवि मृणाल शर्मा ने इस आयोजन का सञ्चालन किया और अपनी कविता से श्रोताओं का मन जीत लिया |
ऑस्ट्रेलिया की ख्याति प्राप्त भारतीय साहित्य और कला संस्था (ILASA ) के तत्वाधान में इस वर्ष भारत की अधिक से अधिक भाषाओँ के कवियों को जोड़ने बेडा इसकी संस्थापक श्रीमति रेखा राजवंशी ने उठाया | हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती, बांग्ला, मारवाड़ी , सिंधी, कच्छी एवं उर्दू में ऑस्ट्रेलिया के कवियों ने अपनी प्रस्तुति दी |
विशिष्ठ अतिथि के रूप में भारत के प्रसिद्द शायर डॉ. नफ़ास अम्बालवी , वैश्विक हिंदी परिवार , दिल्ली से डॉ. विनयशील चतुर्वेदी एवं जानी मानी विदुषी डॉ. मीनाक्षी जोशी (पूर्व सदस्य, महाराष्ट्र राज्य गुजराती साहित्य अकादमी, मुंबई) उपस्थित रही | सिडनी की वरिष्ठ कवयित्री डॉ शैलजा चतुर्वेदी ने सभी कवियों को शुभकामनाये दी एवं अपनी कविता भी सुनाई |
संस्कारधानी के मृणाल ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी कविताओं से वाहवाही बटोरी है | इस आयोजन में भी उन्होंने अपने अंदाज में ‘लिखने ‘ पर लिखी अपनी कविता से उपस्थित श्रोताओं की प्रसंशा बटोरी |
लिखना दुःख तो ऐसा कि,
सुख पानी पानी हो जाये ,
संवाद लिखो तो ऐसा जो
श्री कृष्ण की वाणी हो जाये |
इस आयोजन की विशेष बात यह रही की सात वर्ष से ले कर सत्तर वर्ष के बीस कवियों ने मातृभाषाओं में स्वलिखित रचनाओं का आनंद उठाया |
कविता पाठ के अलावा इस आयोजन में ऑस्ट्रेलिया के लेखकों के दो संकलन का विमोचन भी हुआ | “ऑस्ट्रेलिया की चयनित रचनायें ” लॉन्च किए, जो आईसेक्ट पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित हैं और “वृद्धमान की श्रेष्ठ इक्कीस कहानियाँ ” – भारत में डायमंड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित है | यह दोनो संकलन रेखा राजवंशी द्वारा सम्पादित है | साथ ही रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ओलंपियाड का पोस्टर भी जारी किया गया।
विश्वभर में लगभग ७००० भाषाएँ है जिनमें से आनेवाले ७५ वर्षों में ३००० भाषाओँ का लोप हो सकता है | भाषाओँ को जीवित रखने पर बल देते हुए मृणाल ने अपने सञ्चालन के माध्यम से रह भी कहा की साहित्य प्रेमियों को साहित्य सेवी हो कर इसके प्रचार प्रसार में युद्धस्तर से जुड़ने होगा | विगत कुछ वर्षों में सिडनी में भारतीय भाषाओँ और हिंदी के प्रचार के लिए कई स्तर के आयोजन किये गए है | ऑस्ट्रेलिया के प्रवासी साहित्यकार इस दिशा में निरंतर कार्यरत है | इन्ही प्रयासों से सिडनी की कुछ स्कूलों में हिंदी भी पढाई जा रही है |