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प्रतीकों के देवः देवाधिदेव शिव

राहुल कुमार सिंह

by satat chhattisgarh
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फाल्गुन के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी अर्थात महाशिवरात्रि वह दिवस है जब ब्रह्माण्ड स्वरूप शिवलिंग का आविर्भाव हुआ था। कुछ मतों के अनुसार यह वह दिन है जिस दित से पार्वती ने शिव प्राप्ति के लिये एक पैर पर खड़े होकर अपनी तपस्या प्रारंभ की थी। अन्य मतों के अनुसार यही शिव और पार्वती का परिणय दिवस है। विभिन्न मतमतांतरों का इस बात पर भले ही मतैक्य न हो कि शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, किन्तु महाशिवरात्रि के दिन देवाधिदेव शिव की पूजा और उपवास के फल पर सभी का अवश्य मतैक्य हैं।

The God of symbols: Shiva

शिव की मूर्तियों के बदले शिव-लिंग की पूजा होते देख सभी धर्म-सम्प्रदाय के अनुयायियों को अवश्य उत्सुकता होती है। शिवलिंग की पूजा के विभिन्न कारण प्राचीन धर्म-ग्रंथों में प्राप्त होते हैं, इसके लिये पद्मपुराण में जो कथा है, वह इस प्रकार है-
कल्प के आरंभ में शंकर दो बार अभिशापित हुए हैं, कि आपकी मूर्ति के बदले लिंग और योनि की पूजा लोक में प्रचलित होगी। पहली बार तब, जब त्रिमूर्ति में कौन सबसे अधिक पूज्य और श्रेष्ठ है, इस बात की परीक्षा के लिये भृगु ऋषि कैलास पर्वत पर गये परन्तु द्वार पर नन्दीगण ने उन्हें यह कहकर रोका कि पार्वती-महेश्वर विहार में हैं, और जब ब्रह्मा की सभा में भगवान शंकर, दक्ष के सम्मान में उठ खड़े नहीं हुए तब भी भृगु जी रुष्ट हुए परिणामतः उन्हें दूसरी बार यह शाप मिला।
दूसरी कथा लिंग-पुराण, शिव-पुराण और स्कन्द पुराण में मिलती है, जो इस प्रकार है- एक बार विष्णु और ब्रह्मा में महानता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, विवाद की अवधि में ही एक प्रचण्ड ज्योर्तिमय लिंग, जो अनादि अनन्त था, प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने तय किया कि जो इसका अंत पा लेगा, वही महान होगा। फलस्वरूप विष्णु, वराह रूप में नीचे और ब्रह्मा, हंस रूप में ऊपर गये, दस हजार वर्ष परिश्रम के बाद वे दोनों थककर लौट आये किन्तु ब्रह्मा के कहने पर शंकर के समक्ष केतकी के एक फूल ने झूठी गवाही दी कि ब्रह्मा, लिंग के अग्रभाग का पता लगा आये। तब शंकर ने केतकी को शाप दिया कि लिंगार्चन में केतकी का फूल न बरता जायेगा। इसी ज्योर्तिलिंग की स्थापना करके, प्रजावृद्धि के पवित्र प्रयोजन को स्मरण दिलाने के लिये, उसकी पूजा की जाती है। नये मतों के अनुसार लिंग की पूजा का अन्य अर्थ बतलाया जाता है, लिंग का तात्पर्य लक्षण या चिह्न, अतः लिंग पूजा अर्थात लक्षणों या प्रतीकों के सहारे पूजा, स्वयं शिवलिंग के अलावा शिव की पूजा में कई प्रतीक प्रयोग होते हैं।
लिंग को विभिन्न कारणों का प्रतीक माना गया है यह पूरी प्रतिमा शिव लिंग और पार्वती की योनि (स्कन्दपुराण के अनुसार आकाश और पृथ्वी) का प्रतीक है, प्रतिमा आदि शक्ति पार्वती और परम शक्ति शिव के सम्मिलन का प्रतीक है, यह सृष्टि की उत्पत्ति का भी प्रतीक माना जाता है। यह अशुभ के नाश का भी प्रतीक है, क्योंकि तारकासुर ने वरदान लिया था कि मैं शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र के ही हाथों मारा जाऊं, किन्तु शिव समाधि में थे, पर देवताओं के अनुरोध पर उन्होंने तारकासुर वध के लिये पुत्र उत्पन्न किया जो तारकासुर की मृत्यु का कारण बना।
‘शिव‘ नाम भी एक प्रतीक ही है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है शुभ मंगल, यदि शिव को ‘शव‘ धातु से व्युत्पन्न माना जाय तो इसका अर्थ होगा, ‘निद्रित होना‘ या जिस अवस्था में वासनाएं सो जाती हैं वह ‘शिव की अवस्था‘ है। मांडूक्योपनिषद में इस अवस्था को ‘चतुर्थ‘ कहा गया है। सामान्य मनुष्य जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीन अवस्थाओं का अनुभव प्रतिदिन करता है पर केवल साधना से परिशुद्ध योगी ही सिद्धि की दशा में इस चतुर्थ अवस्था ‘तुरीय‘ का उपभोग कर सकता है, यही निर्विकल्प समाधि की अवस्था है।
शिव का श्मशान से संबंध भी प्रतीक रूप में हैं, ‘श्मशान‘ अर्थात संसार या मृत्युलोक, जहां शंकर का वास होने से सांसारिक नीच मनोवृत्तियां भस्म हो जाती है। शिव जो ‘मुण्डमाल‘ गले में धारण किये रहते हैं वह मृत्यु की याद दिलाकर वैराग्य को उत्पन्न और पुष्ट करता है। उनका ‘विषपान‘ और ‘गंगावतरण‘ आत्मत्याग और दूसरों के कल्याण की सीख देता है। इसी तरह वृषभ (शिव का वाहन) इस बात का प्रतीक है कि वे जीवभाव पर सवारी करते हैं जीव के स्वामी शिव ही है अतः उन्हें ‘पशुपति‘ नाम भी दिया गया है। ‘महाकाल‘ सर्ग के आरंभ में प्रकृति और पुरुष को जोड़ता है तथा प्रलय के समय उन्हें पृथक करता शिव का ‘डमरू‘ सापेक्ष समय का एवं ‘सर्प‘ काल का प्रतीक है। शिव महाकाल के रूप में समय के इन दोनों विभागों पर शासन करते हैं। अग्नि, जल, वायु, आकाश और पृथ्वी, इन पंचभूतों के शासक होने के कारण भूतनाथ हैं।
इसी तरह डमरू, गंगा, चंद्रमा, सर्प और त्रिशूल, पंचभूतों का प्रतीक है। ‘त्रिनेत्र‘ कर्म, उपासना और ज्ञान का ‘त्रिशूल‘ के तीन फल श्रवण, मनन और निदिध्यासन के, पांचों मुख ईशान (स्वामी), अघोर (निन्दित कर्म का शुद्धिकरण) तत्पुरुष (आत्मा में स्थिति लाभ), वामदेव (विकार नाशक) और सद्योजात (बालक की तरह परम स्वच्छ, शुद्ध और निर्विकार), के तथा ‘बिल्व पत्र‘ के तीन दल सत्व, रज और तम चित्त रूप के प्रतीक है, जिन्हें शिव पर चढ़ाने से जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन अवस्थाओं से युक्त जन्म का नाश हो जाता है और मुमुक्षु तुरीय की चतुर्थ अवस्था में पहुंचकर मुक्त हो जाता है। इन सब प्रतीकों के स्वामी महादेव शिव की कृपा कितनी आसानी से प्राप्त हो सकती है, शिव पूजा का क्या महत्व है? तथा उनकी पूजा किस तरह की जा सकती है? निम्नलिखित श्लोक में इन्हें स्पष्ट किया गया है-
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयामुधम। त्रिजन्मपाप संहारं एक विल्वं शिवार्पण्।।
यह लेख 7 मार्च 1978 को रायपुर से प्रकाशित दैनिक ‘नवभारत‘ समाचार पत्र में छपा था। संभवतः मेरा लिखा पूरे आकार का यह पहला प्रकाशित लेख है। तब मेरी आयु बीस पूरी नहीं हुई थी। रायपुर विवेकानंद आश्रम के छात्रावास में रहता था, साधु-संतों की वाणी और समृद्ध पुस्तकालय का लाभ सहज सुलभ था। छपने पर स्वामी आत्मानंद जी महराज से शाबासी भी मिली। मेरे लिए तो यही बहुत था कि उनकी नजर से यह गुजरा है। उन दिनों नवभारत में लेख छपना, यानि क्या कहने। प्रेस, अखबार, और उसके पत्रकार-लेखक और संपादक के साक्षात अस्तित्व से, गोविंदलाल वोरा जी, बबन मिश्र जी, रामअधीर जी से मिल कर, पहले-पहल परिचय हुआ। प्रेस में मशीन की आवाज, स्याही और कागज की मिली-जुली महक और माहौल से पहचान बनी। प्रूफ-रीडिंग और कलम घिसाई, होते देखा। लिखना-छपना, इसके बाद धीरे-धीरे अजनबी नहीं रहा।

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