छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023
इसी साल 2023 के नवम्बर-दिसम्बर माह में संभावित जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उनमें सबसे छोटा राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहता है। सन् 2000 में नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद यहां अजीत जोगी के नेतृत्व में पहली बार कांग्रेस की सरकार बनी। सन् 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में यहाँ पहली बार भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई। सन् 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता की हैट्रिक बनाई परंतु सन् 2018 के चुनाव में कांग्रेस को कुल 90 विधानसभा सीटों में से 68 सीटों पर शानदार सफलता मिली और काफी कसमकस के बाद अंततः छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष भूपेश बघेल के नेतृत्व में सरकार बनी।
छत्तीसगढ़ में जनोपयोगी योजनाओं
सन् 2018 में पंद्रह साल बाद सरकार बनने के तुरंत बाद से ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार द्वारा अनेक प्रकार की जनोपयोगी योजनाओं का संचालन कर लोगों का दिल जीतने की भरपूर कोशिश की गई। सन् 2020 में कोरोना महामारी के समय राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई पहल से यहाँ से अन्य राज्यों के श्रमिकों का पलायन नहीं के बराबर ही हुआ। कोरोना से मौत भी अपेक्षाकृत कम ही हुआ। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्वयं एक किसान हैं। उन्हें कृषि और कृषकों की मूलभूत समसयाओं की अच्छी समझ है। उनका अंदाज भी ठेठ छत्तीसगढ़िया का है। यही कारण है कि वे आज की तिथि में किसानों के मध्य सर्वाधिक लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं।
‘छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी, नरवा, गरवा, घुरवा, बारी, ऐला बचाना हे संगवारी’ का नारा देकर उन्होंने राज्यभर में कृषि और कृषकों के उत्थान के लिए अनेक योजनाएँ शुरु की है। इनमें कुछ प्रमुख योजनाएँ हैं- राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, मुख्यमंत्री हाट-बाजार क्लिनिक योजना, हाफ बिजली बिल योजना, स्वामी आत्मनंद उत्कृष्ट विद्यालय योजना, मुख्यमंत्री मितान योजना। यही कारण है कि पिछले चार सालों में हुए सभी विधानसभा के मध्यावधि चुनावों एवं पंचायत-नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली है। हालांकि विधानसभा चुनाव के मात्र छह महीने बाद ही हुए लोकसभा चुनाव 2019 में छत्तीसगढ़ राज्य के 11 में से 10 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को जीत मिली थी।
छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल का फार्मूला
2018 में छत्तीसगढ़ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही ऐसा माना जा रहा था कि यहाँ ढाई-ढाई साल का फार्मूला रहेगा। अर्थात् पहले ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे और अगले ढाई साल टी.एस. सिंहदेव मुख्यमंत्री का पद संभालेंगे। काफी कसमकस और ऊहापोह के बावजूद पिछले लगभग पौने पाँच साल से भूपेश बघेल ही मुख्यमंत्री के पद पर बने रहे। बीच-बीच में टी.एस. सिंहदेव के अनेक बार महत्वाकांक्षी बयान भी आते रहे, जिससे ढाई-ढाई साल के फार्मूले की बात को बल मिलता रहा। हालांकि अधिकृत तौर पर कांग्रेस की ओर से इस सम्बन्ध में कोई भी अधिकृत बयान कभी भी जारी नहीं किया गया। इतना जरूर हुआ कि विधानसभा चुनाव के लगभग पाँच महीना पहले ही जुलाई 2023 में टी.एस. सिंहदेव को राज्य का उप मुख्यमंत्री बना दिया गया, ताकि अगले विधानसभा चुनाव में सरगुजा अंचल में कांग्रेस पार्टी को पूर्ववत समर्थन और सफलता मिल सके। अनमने ढंग से ही सही, टी.एस. सिंहदेव ने भी उप मुख्यमंत्री का पद संभाल लिया है। अनमने शायद इसलिए भी कि महज पाँच महिने के लिए ही यह पद मिला है और वैसे भी इस पद का कोई विशेष अधिकार तो होता नहीं। हाँ, इतना जरूर है कि उप मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करने के साथ ही टी.एस. सिंहदेव छत्तीसगढ़ राज्य के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गए राज्य के प्रथम उप मुख्यमंत्री के रूप में।
छत्तीसगढ़ में महज चार महिने पहले संतुलन का प्रयास
चुनाव के महज चार महिने पहले जुलाई 2023 में कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाने एवं युवा मतदाताओं को साधने की दृष्टि से जहाँ 42 वर्षीय सांसद दीपक बैज को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है, वहीं मंत्रिमंडल में निवर्तमान अध्यक्ष मोहन मरकाम को शामिल किया गया है। उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करने के साथ ही बस्तर संभाग से अब दो मंत्री हो गए हैं। पहले इस क्षेत्र से कवासी लखमा ही एकमात्र मंत्री थे। डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम के मंत्रीमंडल से बाहर होने के बाद अब सरगुजा संभाग से भी दो मंत्री रह गए हैं – एक उप मुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव और दूसरे अमरजीत भगत। मंत्रीमंडल से बाहर हुए डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को योजना आयोग का अध्यक्ष बनाकर केबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। केबिनेट के आंशिक फेरबदल में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का राजीतिक चातुर्य स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उन्होंने मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार रहे टी.एस. सिंहदेव को पहले ही उप मुख्यमंत्री तो बना ही दिया था, अब उन्हें अपने पास ही लगभग साढ़े चार साल से रखे हुए ऊर्जा विभाग का दायित्व भी सौंपकर नाराजगी कम करने का प्रयास किया है। प्रदेश के कद्दावर नेता और 2019 में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल रहे ताम्रध्वज साहू को कृषि विभाग का भी दायित्व सौंपकर उनका भी कद बढ़ाया है। एक अन्य प्रमुख नेता रबींद्र चौबे से कृषि विभाग को लेकर उन्हें शिक्षा विभाग का दायित्व सौंपा गया है, जो कि पहले डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम के पास था। इसी प्रकार लगभग साढ़े चार साल बाद मंत्रीमंडल से बाहर हुए डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को अपने पास ही रखे योजना आयोग के अध्यक्ष का पद और केबिनेट मंत्री का दर्जा देकर संतुष्ट करने की कोशिश की है। हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि इस फेरबदल से नाराज़ होकर छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती फूलोदेवी नेताम, जो कि राज्य सभा सांसद भी हैं उन्होंने छत्तीसगढ़ महिला कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।
इस साल के अंतिम महीने में होने वाले पांचवें विधानसभा चुनाव में वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य में मुख्य मुकाबला भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच ही रहने की संभावना है, परंतु पिछला रिकॉर्ड देखा जाए, तो विगत कुछ चुनावों में बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) और जोगी कांग्रेस जनता (जे.सी.जे.) को भी कई सीटों पर जीत मिली थी। इस बार आम आदमी पार्टी भी पूरी तैयारी और दमखम के साथ ताल ठोंकने को तैयार है। इससे इस आशंका से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि यदि ये तीनों पार्टियाँ मिलकर भी 10-12 सीटें हासिल कर लें, तो सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और भाजपा को इनकी मदद लेने की भी नौबत आ सकती है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा भी बहुत अच्छी स्थिति में नही
कुल 90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ विधानसभा के मामले में प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही एक-एक सीट का महत्व भलीभांति जानते और समझते हैं, इसलिए वे सत्ता में काबिज होने के लिए किसी भी प्रकार की कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहते। पिछले छह महीने में ही स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उनकी सरकार के अनेक दिग्गज केंद्रीय मंत्री अमित शाह, नितिन गडकरी, जे.पी. नड्ढा, गिरीराज सिंह, राजनाथ सिंह, धमेन्द्र प्रधान छत्तीसगढ़ आकर भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के प्रयास में जुट गए हैं। पिछले दिनों डी. पुरंदेश्वरी की जगह प्रदेश प्रभारी बनाए गए ओम माथुर भी लगातार प्रदेश का दौरा कर छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों से मिल रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस बार भाजपा घोषणा-पत्र के साथ ही साथ आरोप पत्र भी बनाएगी, जिसमें कांग्रेस सरकार के वादाखिलाफी और भ्रष्टाचार को प्रमुखता के साथ उजागर करने की बात कही जा रही है। इसके लिए दो अलग-अलग समितियों का गठन किया जा चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का लाल किले से दिए गए सपनों से भरपूर भाषण
छत्तीसगढ़ में लम्बे समय तक दिखी आंतरिक कलह और गुटबाजी 
वहीं लगातार आंतरिक कलह और गुटबाजी के कारण आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार बचाना आसान काम नहीं होगा। पंद्रह साल के एक लम्बे अंतराल के बाद सत्ता में वापसी करने के बाद कांग्रेस के अनेक छोटे-बड़े कार्यकर्त्ता उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें सरकार में महत्वपूर्ण पद एवं जिम्मेदारियाँ मिलेंगी, परंतु व्यवहार में ऐसा हुआ नहीं। आज भी अनेक निगम, मंडल, आयोग, प्राधिक्करण के अध्यक्ष एवं सदस्यों के ऐसे दर्जनों पद रिक्त पड़े हुए हैं, जहाँ कि पार्टी के कुछ योग्य एवं निष्ठावान नेताओं, कार्यकर्ताओं को बिठाकर संतुष्ट किया जा सकता था।
छत्तीसगढ़ में पुनः सरकार बनाने की कंटीली राह की बात कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी भलीभांति जानता है। पिछली बार मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी द्वारा तख्तापलट और राजस्थान में गहलौत-पायलट तकरार के कारण स्थायी रूप से लटकती तलवार के बीच एकमात्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का छोटा-सा ही सही, परंतु मजबूत इस गढ़ को वह किसी भी कीमत पर ढहने नहीं देना चाहेगी। यही कारण है कि पहली बार छत्तीसगढ़ के किसी भी कांग्रेसी नेता को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लगभग सभी मंचों पर देखा जा रहा है। यही नहीं, विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ सौंपी जा रही है। पिछले दिनों ही पहली बार छत्तीसगढ़ राज्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ऐतिहासिक राष्ट्रीय महाधिवेशन भी आयोजित किया गया।
छत्तीसगढ़ में भाजपा के सीनियर आदिवासी नेता अब कांग्रेस
अब ज्यों-ज्यों दिन बीतता जा रहा है, छत्तीसगढ़ अंचल में राजनीतिक हलचल और गहमागहमी बढ़ती ही जा रही है। यहाँ दलबदल का खेल शुरु हो चुका है। कभी भारतीय जनता पार्टी की ओर से आदिवासी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे रहने वाले नंदकुमार साय अब भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। जशपुर अंचल एवं आदिवासियों के बीच पैठ बनाने की दृष्टि से कांग्रेस ने उन्हें राज्य औद्योगिक विकास निगम का अध्यक्ष बनाते हुए केबिनेट मंत्री का दर्जा देने में जरा-सी भी देरी नहीं की। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सहित भारतीय जनता पार्टी के अनेक प्रमुख नेताओं ने बयान दिया कि कई पूर्व कांग्रेसी विधायक उनके सम्पर्क में है और बहुत जल्द वे भाजपा प्रवेश करने वाले हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश के निवर्तमान कांग्रेसाध्यक्ष एवं वर्तमान में आदिम जाति, अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहन मरकाम सहित कई मंत्री और संसदीय सचिव लगातार बयान दे रहे हैं कि आने वाले समय में भारतीय जनता पार्टी के कई बड़े और कद्दावर नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं।
छत्तीसगढ़ में आप ( आम आदमी पार्टी ) भी तलाश रही है अपनी जमीन 
कुछ प्रशासनिक अधिकारी राजनीतिक सुख-भोग की चाह में स्तीफा दे चुके हैं या फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत कर चुके हैं। संभावना है कि इस बार लगभग दर्जनभर ऐसे अधिकारी विभिन्न दलों के टिकट पर अपनी किस्मत आजमाएँगे। आम आदमी पार्टी की सक्रियता में अनेक पूर्व एवं वर्तमान छोटे-बड़े अधिकारी – कर्मचारी संघ के नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका देखी जा सकती है। पिछले महीने ही आम आदमी पार्टी के प्रमुख नेता, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी छत्तीसगढ़ का एक दौरा कर यह जता चुके हैं कि उन्हें छत्तीसगढ़ राज्य में कतई कमजोर न समझा जाए।
छत्तीसगढ़ में दोनों प्रमुख पार्टियों ने मुख्यमंत्री का चेहरा अभी तक घोषित नहीं किया
प्रमुख राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से किसी भी नेता को अभी तक मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया गया है और न ही करने की उम्मीद है। हालांकि जनता के सामने आज भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा भूपेश बघेल ही हैं; जबकि भारतीय जनता पार्टी की ओर से डॉ. रमन सिंह ही मुख्यमंत्री फेस हैं। इसकी वजह भी है, आजकल दोनों ही दलों के केंद्रीय नेतृत्व में इन दोनों को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है। कांग्रेस की ओर से इतना जरूर है कि प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष का पदभार संभालते ही दीपक बैज ने अपने पहले ही उद्बोधन में कहा है कि 2023 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि सभी जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी में विधायक दल के नेता का चुनाव इतना आसान नहीं है। रही बात छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में मुद्दों की, तो कांग्रेस पार्टी पिछले पौने पांच साल में किए गए प्रमुख कार्याें एवं उपलब्धियों के आधार पर वोट मांगेगी; जबकि भाजपा केंद्र की मोदी सरकार की जनहितकारी कार्यों, योजनाओं और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में हुए अनेक भ्रष्टाचार, सन् 2018 में कांग्रेस द्वारा अपने जन घोषणा-पत्र में किए गए पूर्ण शराबबंदी, बेरोजगारी भत्ता, अनियमित कर्मचारियों का नियमितिकरण, सरकारी कर्मचारियों को चार स्तरीय समयमान वेतनमान वादे, जो कि आज तक पूरे नहीं हो पाए हैं; उनको जनता के सामने रख कर वोट मांगेगी।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि छत्तीसगढ़ में सत्ता की सीढ़ी क्षेत्र, संप्रदाय और जातिगत समीकरणों को साधकर ही चढ़ी जा सकती है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों द्वारा टिकट, दायित्व एवं पद वितरण में यहाँ के प्रमुख पंथ एवं जातिगत जैसे सतनाम, कबीरपंथ, गोंड, साहू, कूर्मी, अघरिया आदि के नेताओं को संबंधित क्षेत्र की आबादी के अनुसार प्राथमिकता देनी होगी।
मणिपुर करे पुकार, बुलडोज़र लाओ सरकार! (व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा)
छत्तीसगढ़ में चुनाव के नजदीक आते-आते कई नाटकीय घटनाक्रम देखे जा सकते है
बहरहाल विधानसभा चुनाव में अभी कुछ देर है। आने वाले समय में अनेक नाटकीय घटनाक्रम देखने को मिलने वाले हैं। वैसे यहाँ की जनता प्रबुद्ध है। यहां की प्रबुद्ध जनता ने 2018 के विधानसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग तीन चौथाई सीटों पर जीत दिलाकर जहां उसे सिर आंखों पर बिठाया था वहीं महज छह महीने बाद ही हुए लोकसभा चुनाव में उसी कांग्रेस को 11 में से महज 2 ही सीटें दी थी। छत्तीसगढ़ की मतदाताओं के मूड को भाँपना यक्ष प्रश्न ही है। इसलिए अभी से किसी का भी नाम या चेहरा देखकर या फिर एक्जिट पोल के आधार पर हवाई अंदाजा लगाना जल्दबाजी ही होगी।
दीप्तिरेखा शर्मा
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