...

सतत् छत्तीसगढ़

Home विचार TOP NEWS : ऋतु वसन्त है, सब बौराए

TOP NEWS : ऋतु वसन्त है, सब बौराए

अजय तिवारी

by satat chhattisgarh
0 comment
The season is spring, everything is blooming

यहाँ तक कि आम भी बौरा गए हैं!

बहुत समय बाद एक पारिवारिक शोक प्रसंग में अवध के किसी गाँव में जाना हुआ। हिंदीप्रदेशमें विशेषतः हिंदुओं में, उसपर ब्राह्मणों में, जन्म से अधिक कर्मकांड मृत्यु पर होते हैं। बदली हुई जीवन स्थितियाँ अनुमति नहीं देतीं तो पुरोहितों ने विकल्प निकाल दिए हैं। तेरहवीं और फिर वर्षी के लिए तीन दिन में दो बार सारे-सारे दिन के लिए जाना था। अपेक्षाकृत सम्पन्न परिवार होने से गाँव में ब्राह्मणों के टोले के एक सिरे पर चारों ओर खेतों से घिरी ज़मीन पर दो हिस्सों में मकान है।

एक तरफ वर्षी का पिंडदान चल रहा था और दूसरी तरफ सिर पर गिरते आम के बौर के फूलों से मन गमक रहा था। कई साल बाद गाँव में था। वह भी वसन्त में। मेरी चाची अपने गाँव आने के लिए कहते-कहते आखिर पिछली गर्मियों में काल कवलित हो गयी लेकिन बीमारियों के छः-सात वर्ष लम्बे दुष्चक्र ने जाने की इजाज़त नहीं दी। मौका मिला तो बगल के ज़िले प्रतापगढ़ के इस गाँव (लपकन) जाने का मौका नहीं छोड़ा।

आम फिर बौरा गए हैं

सच कहता हूँ कि पहले तो आम के बौर देखकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी याद आये–‘आम फिर बौरा गए हैं’! कुछ देर से एक मित्र के साथ खेत और बाग की ओर चला गया। कितने दिन बाद ‘किचन गार्डन’मेँ धनिया और हरी प्याज़ से उठती गन्ध को नज़दीक से सूँघा! बाग खेत से लगा हुआ था। एक तरफ गेहूँ की झूमती बालियाँ और दानों से भरी सरसों की छीमियाँ, दूसरी तरफ आम तौर महुआ के विशाल वृक्षों में व्याकुल करने वाली गन्ध से भरे बौर! मुझे लगा, मेँ भी इसी मेँ बौरा जाऊँगा।

इस सिलसिले में डूबे हुए मन पर नागार्जुन छाए रहे–‘

बहुत दिनों के बाद/ अबकी मैं जी भर छू पाया/ अपनी/ गँवई पगडण्डी की चन्दनवर्णी धूल!’

एकाएक महसूस हुआ कि गन्ध धरती का गुण है जो अलग-अलग वनस्पतियों मेँ उनके स्वभाव से मिलकर खुशबू बन कर आती है। इस बात को निराला ने जान लिया था। गन्धमादन को तिरस्कृत करने वाले समाज में उन्होंने दार्शनिक स्तर पर अनुभव को ले जाकर कहा था–‘गन्ध व्याकुल कूल उर सर/ मधुर स्वर झंकार, रे कह!’

वर्तमान का सांस्कृतिक चेहरा

लगा, अगर दस-पन्द्रह दिन गाँव में रह जाऊँ तो छूटी हुई कविता फिर पकड़ लेगी। हालाँकि मुझे पता है, वह बुरा दिन होगा क्योंकि काफी खराब कविताएँ लिखता हूँ। मेरे समय के अनेक कवि जैसा लिख रहे हैं, उससे हमारे वर्तमान का सांस्कृतिक चेहरा बनता है। नाम गिनाने मेँ ख़तरा है। फिर भी इतना कहना चाहता हूँ कि मेँ अपने कवि-मित्रों को बहुत प्यार करता हूँ क्योंकि उनमें अपने अभाव की पूर्ति पाता हूँ। नहीं जानता कि जिन दस-पन्द्रह कवियोँ की रचनाएँ देखकर बहुत सुख मिलता है उनमें से कितने भविष्य में रह जायेंगे लेकिन अगर प्रकृति के सम्मोहक रुपों पर ही लिखूँगा, तब भी मेघदूत और विक्रमोर्वशीय वाले कालिदास, मल्टी6माधव वाले भवभूति, अयोध्या कांड वाले तुलसीदास, शेली, निराला जैसे पूर्वजों का क्षुद्र अनुकरण भी न बन सकेगा।

वसन्त के साथ फाग का गहरा नाता है

पर क्या इसी कारण खेत और बाग के सम्मोहन पर बात न करूँ? लगभग पाँच-छः साल बाद पहली बार घर से निकला और वह भी नौ दस दिनोँ की लंबी यात्रा पर। बनारस, इलाह6, प्रतापगढ़–यह सारा अनुभव मुझे पुनर्नवा करने वाला रहा। संयोग देखिए, वसन्त प्रकृति का पुनर्जीवन है, वह मनुष्य का भी भी पुनर्जीवन है। और मुझे एक पारिवारिक सम्बन्धी की मृत्यु पर पुनर्जीवन का अवसर वसन्त में ही मिला। सच कहता हूँ, मैंने पाया कि जितनी दुर्दांत मृत्यु है, उतना ही अपरिहार्य जीवन है। हालाँकि जन्म उतना निश्चित नहीं है जितनी निष5मृत्यु है, फिर भी मृत्यु और जीवन का साथ-साथ अस्तित्व मुझमें वैराग्य भाव आने से रोकता है। वसन्त मन छा गया है, पतझड़ मन से बहुत दूर है! हमारे अवध मेँ वसन्त के साथ फाग का गहरा नाता है। जिनके जीवन में पतझड़ आ गया है, उन्हें भी जीने का उल्लास देने के लिए यह लोकगीत प्रचलित है कि–फागुन मेँ बाबा देवर लागैं!!

You may also like

managed by Nagendra dubey
Chief editor  Nagendra dubey

Subscribe

Subscribe our newsletter for latest news, service & promo. Let's stay updated!

Copyright © satatchhattisgarh.com by RSDP Technologies 

Translate »
Are you sure want to unlock this post?
Unlock left : 0
Are you sure want to cancel subscription?
-
00:00
00:00
Update Required Flash plugin
-
00:00
00:00
Verified by MonsterInsights