रामकथा का सार ही करुणा
समरसता का आधार है करुणा. रामकथा का सार ही करुणा, वेदना, संघर्ष है. इसलिए राम के चरित्र के माध्यम से समाज में समरसता का प्रसार आसानी से हो सकता था. एक साधारण गृहस्थ अपने नास्तिक मित्र से ‘जय सियाराम’ कहता था और गाँव का आदमी भी ‘राम-राम’ के अभिवादन से शुरुआत करता था. तुलसीदास शायद इसीलिए संसार को ‘सीयराममय’ जानकार प्रणाम करते थे. लेकिन १९८७ में राममंदिर को लेकर आन्दोलन शुरू होने के बाद अचानक माहौल इतना गरम हो गया कि करुणा का स्थान उत्तेजना ने, वेदना का स्थान हिंसा ने और संघर्ष का स्थान प्रतिस्होश ने ले लिया. इसका साक्षात्कार मुझे १९८९-९० में इलाहबाद से जौनपुर की यात्रा के दौरान बस में हुआ. किसी से बातचीत में मैंने कहा कि राम भी ऐतिहासिक पुरुष थे और बाबर भी ऐतिहासिक पुरुष थे, इन समस्याओं को समाज की वर्तमान ज़रूरतों के आधार पर तर्क और साक्ष्य से हल किया जा सकता है. इसके पहले कि बात पूरी होती, पीछे की ओर बैठे आठ-दस युवक, जिनमें कइयों के गले में केसरिया पट्टा लटका था, कूदकर मेरे चारो तरफ इकठ्ठा हो गए—‘राम को ऐतिहासिक पुरुष कैसे कहा? राम भगवान है!’ लगा, वे हमला करेंगे. अध्यापक होने के कारण बातचीत का रास्ता अपनाना संभव हुआ. बस में बैठी मुस्लिम महिलाएँ काँप रही थीं. निस्संदेह, उन्हें मेरे साथ सहानुभूति थी.
राम के जीवन चरित्र
तब से यह उत्तेजना सुनियोजित ढंग से बढाई गयी है. आज जब हमारे राम का मंदिर तैयार हो रहा है तब एक ओर सरकार, सरकारी तंत्र और कॉर्पोरेट मीडिया रात-दिन के गर्वीले प्रचार अभियान में लगे हैं, दूसरी तरफ आशंका और भय से सन्नाटा पसरा है. पूरा समाज मानों बँट गया है. राम के जीवन चरित्र को देखते हुए क्या यह नहीं हो सकता था कि इस अवसर पर जाति, धर्म, क्षेत्र का भेद भुलाकर पूरा देश इस महत्वपूर्ण आयोजन में शामिल होता? लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि जो राजनीति इस अवसर के लिए उत्तरदायी है, वही समाज को उत्तेजना और आशंका में बाँटने के लिए भी उत्तरदायी है. भारत की धर्मनिरपेक्षता कसौटी पर है. राममंदिर आन्दोलन के साथ जिन चीजों को बलि चढ़ाया गया, उनमें सामाजिक सद्भाव, धार्मिक सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता का मूल्य सर्वोपरि हैं. कोई सामान्य बुद्धि का मनुष्य यह नहीं कह सकता कि किसी को चारों तरफ से घेरकर मारते-पीटते हुए यह कहलाने से समरसता बढ़ती है कि ‘हिंदुस्तान में रहना है तो जय श्रीराम कहना है!’
‘हिन्दू राष्ट्र’
धर्म से राष्ट्रीयता को जोड़ने का यह अभियान अंततः ‘हिन्दू राष्ट्र’ तक जाता है जिसका प्रचार आजकल न केवल तरह-तरह के ‘संत’ करते हैं बल्कि उन संतों को संरक्षण देनेवाले नेता भी बड़े गर्व से जिसका उद्घोष करते हैं. धार्मिक राज्यों की स्थिति क्या होती है, इसे हम जानते हैं. अफगानिस्तान, ईरान, पाकिस्तान या सऊदी अरब की नागरिक पीड़ाओं से कौन परिचित नहीं है? नेपाल ने जनतंत्र अपनाने के साथ ‘हिन्दू राष्ट्र’ का आसन त्याग दिया. इन तथ्यों से स्पष्ट है कि धार्मिक राज्य और जनतान्त्रिक राज्य की संकल्पनाएँ एकदम विपरीत हैं. हिन्दू राष्ट्र रहते नेपाल राजशाही के सामंती घुटन में एक आत्यन्त पिछड़ा और दमित समाज था. हालाँकि उसके हिन्दू राष्ट्र न रहने पर भारत की वर्तमान सरकार ने संबंध बिगाड़ने की कोशिश की लेकिन नेपाल दबाव में नहीं आया. पाकिस्तान भारत का हिस्सा था. आज़ादी के समय अलग देश बना. वहाँ का इस्लामी राज्य न मुसलमानों को खुशहाली और विकास दे सका, न अपनी अर्त्थव्यवास्था को ही संभाल सका. आज वह तबाही और भुखमरी के कगार पर है. यह भी गौर करने की बात है कि आरंभ से ही पाकिस्तान फौजी तानाशाहियों के चक्रव्यूह में घिरा रहा है और हर बार जनतंत्र स्थापित करने की कोशिश पर अमरीका समर्थित फौजी जनरलों ने हमला किया, तख्ता पलट किया. जनतंत्र के बिना विकास संभव नहीं है, यह आधुनिक विश्व की अकाट्य सचाई है. हम राम के बहाने इस जनतंत्र को नष्ट करके धार्मिक राज्य कायम करने का सपना देख रहे हैं. जबकि स्वयं राम का चरित्र इस सीमा तक जनतान्त्रिक था कि वनवास से लौटकर अयोध्या का
राज्य संभालने के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप में ऐलान किया:
जौ कुछ अनुचित भाखाहुं भाई, तौ मोहि बरजेउ भय बिसराई.
राम और सत्ता
मैं राजा हूँ फिर भी कुछ अनुचित कह सकता हूँ; प्रजा के हर सदस्य को अधिकार है कि ऐसा होने पर वह मुझे बिना भय के वर्जित कर दे! इस राम से अपरिचित लोग ही आतंक के बल पर ‘गोली मारो…’ का सार्वजनिक नारा लगाते हैं. अफ़सोस की बात है कि मॉब लिंचिंग करने वाले हों, त्रिशूल-स्टेनगन लेकर धार्मिक जुलूस निकालने वाले हों या मीडिया के ज़रिये ज़हरीला प्रचार करने वाले हों, वे सब के सब बेदाग बचे रहते हैं, इन बातों पर आपत्ति करने वाले कभी भीड़ के, कभी पुलिस के और कभी अन्य संस्थाओं के शिकार बनते हैं. राम के महान व्यक्तित्व से अनभिज्ञ ऐसे रामभक्तों की गतिविधियोँ ने स्वयं राम का अवमूल्यन किया है. मुझे याद कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद कथाकार अखिलेश ने ‘समय सूत्रधार’ पत्रिका में लालकृष्ण अडवानी का साक्षात्कार लिया था जिसमें उनसे रामकाव्य परंपरा के बारे में पूछा था. अडवानी ने स्पष्ट कहा था कि उन्होंने बाल्मीकि, भवभूति, कालिदास किसी को नहीं पढ़ा है. अब के रामभक्त तो तुलसी, निराला, कैफ़ी आज़मी के रामकाव्य से भी अपरिचित हैं.
व्यापक समरसता राम का चरित्र
हमारे समाज में राम के आधार पर एक व्यापक समरसता उनके चरित्र के उदात्त और करुण पक्ष के कारण बना था. लेकिन वह किसी राजनितिक उद्देश्य से नहीं था. जबसे राम को सत्ता के लिए राजनीतिज्ञों ने साधन बनाया, तबसे वह समरसता नष्ट हो गयी, वैमनस्य और आतंक का माहौल पनप गया. बड़े विज्ञापनदाताओं के सहयोग से चलने वाला मुख्यधारा का मीडिया नफरती, भड़काऊ और सुनियोजित ‘बहसें’ आयोजित करके इस माहौल को और गरम करता है. हिन्दू पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में संघ-भाजपा के नेता या उनके अनुमोदित ‘संत’ को और मुस्लिम पक्ष के प्रतिनिधि के रूप में किसी जाहिल, कट्टरपंथी मौलवी या उसी तरह के व्यक्ति को बिठा दिया जाता है. खुद एंकर सबसे ज्यादा बोलता है. इस तरह की गतिविधियों पर उच्चतम न्यायलय ने कई बार टिप्पणियाँ कीं लेकिन उन्हें नियंत्रित करने के लिए सरकार की इच्छाशक्ति चाहिए औए सरकार इसे सत्ता के स्थायित्व का साधन मानती नज़र आती है.
सबसे बड़े रामभक्त तुलसीदास
हिन्दीभाषी समाज में सबसे बड़े रामभक्त तुलसीदास हैं. मुस्लिम विद्वानों में मुहम्मद अयूब खान से लेकर मु. सुलेमान आसिफ तक एक पूरी परंपरा है जिसने सामाजिक समरसता के प्रसार में तुलसी की भूमिका की सराहना की है. इसी प्रकार अमरीकी पादरी एटकिन्स से लेकर फादर कामिल बुल्के तक अनेक इसाई पादरियों ने भी तुलसी की सहिष्णुता, परदुखकातरता और मानवतावाद का ऊँचा मूल्य आँका है. लेकिन तुलसी के राम ‘सीताराम’ या ‘सियाराम’ हैं. सीता के बिना राम को तुलसी स्वीकार नहीं करते इसीलिए राजा बनने के बाद की कथा को उन्होंने ‘रामचरितमानस’ में शामिल नहीं किया. राम के जीवन के दोनों कलंक राजा बनने के बाद के हैं—सीता का परित्याग और शम्बूक का वध. तुलसी के सबसे प्रिय पद हैं—मंगल और विवेक, जिनकी सबसे अधिक बलि वर्तमान ‘राममंदिर’ प्रकरण में चढ़ी है. इसिमंगल और विवेक से राम परिचालित हैं. वे शबरी के बेर खाते हैं, केवट को भाई बनाते हैं, संसार के प्रत्येक कण में राम का अस्तित्व देखते हैं
सीयाराम मय सब जग जानी. करहुं प्रनाम जोर जुग पानी. राम के इस आदर्श से समरसता का मार्ग निकालता है, राम के नाम पर सत्ता की लालसा से द्वेष, ध्रुवीकरण और बदजुबानी-बदगुमानी को प्रोत्साहन देने से नहीं. इसका दुखद उदहारण यह है कि बाल्मीकि की अयोध्या में और दशरथ की रसोई में तरह-तरह का मांस पकता है लेकिन र्स्म्मस्न्दिर की अयोध्या में मांस की बिक्री प्रतिबंधित कर दी गयी है. क्या एक समुदाय को निशाना बनाकर समरसता हासिल होगी? हमें परंपरा से प्राप्त राम और राजनीति द्वारा प्रदत्त राम का फर्क समझना पड़ेगा.