गणपति बहुत प्रज्ञावान थे
एक और उदाहरण लें । इस दावे की पुष्टि करने के लिए कि गणपति बहुत प्रज्ञावान थे, यह् बताना आवश्यक था कि उन्होंने बड़े गूढ़ रहस्य और उच्चस्तरीय दार्शनिक प्रवचन दिए। इस प्रकार बाद में लिखा गया ‘गणेश गीता’ नामक एक ग्रंथ हमें मिलता है जिसमें गणेश से दर्शन पर व्याख्यान दिलाए गए हैं। कितु इस ग्रंथ को लिखने वाला व्यक्ति स्वयं कोई बुद्धिमान आविष्कारक नहीं था। क्योंकि इसका पाठ शब्दश: वही है जो ‘श्रीमद् भगवद् गीता’ का है।
अंतर केवल यही है कि यहां कृष्ण के स्थान पर गणेश का नाम रख दिया गया है। (98.439)
गणेश जी और रिद्धि सिद्धि की यह प्रतिमा छत्तीसगढ़ में मल्हार नामक स्थान पर उत्खनन में प्राप्त हुई थी
वास्तव में गणपति अपनी बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता की कीर्ति से भी अधिक पुराने हैं। आधुनिक विद्वान इस बात की अनदेखी कर गए हैं और उन्होंने व्यर्थ ही कीर्ति और गणपति के काल को
एक दूसरे से जोड़ने का प्रयत्न किया है ।
मेरा विचार है कि गणपति की बुद्धिमत्ता और प्रज्ञा की ख्याति इस कारण है कि उन्हें
बृहस्पति समझा गया, जिन्हें ऋग्वेद में प्रज्ञा और बुद्धि का देवता माना गया है और ऋषि-
राज कहा गया है। (72. 49)
यह कथन संतोषजनक नहीं हो सकता । प्रारंभिक वैदिक साहित्य में प्रज्ञा और बुद्धि जैसे विशेष गुण केवल ब्राह्मणस्पति के ही नहीं थे। इसके अलावा “मानव गृह्य सूत्र’ और ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’
दोनों में ही निश्चित रूप से यह सिद्ध कर दिया गया है कि गणपति की बुद्धिमत्ता की ख्याति बहुत प्राचीन नहीं हो सकती थी।
गणपति की प्रज्ञा की ख्याति के संबंध में मोनियर विलियम्स ने जो स्पष्टीकरण दिया है वह विलक्षण अधिक और विश्वसनीय कम है (99. 343) | विलियम्स नें इस देवता के बौद्धिक स्तर को उसके सिर के आकार के अनुसार बताना चाहा, गणेश की बौद्धिक विलक्षणता दर्शाने के लिए उस पर हाथी का सिर लगाया गया था। यह संभवतः
मनमाना निष्कर्ष है। गणेश के हस्तिमुख के पीछे कुछ और ही रोचक कथा है।
परस्परविरोधी पौराणिक कथाएं
जो विघ्नकर्ता सिद्धिदाता बन गया उसे उच्च वंश का वंशज बताना आवश्यक था। स्वाभाविक है कि पुराणों के रचयिताओं को यह कार्य काफी कठिन प्रतीत हुआ और पौराणिक साहित्य ने गणपति के जन्म के बारे में सोचा | फाउचर ने ठीक ही कहा है:
इन कथाओं की अप्रासंगिकता से भी अधिक इनकी विसंगतियां यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त होंगी कि अभीष्ट बात को प्रस्तुत करने की आवश्यकता की पूर्ति के लिए, सामान्य से भी निम्न स्तर के लेखकों ने बहुत बाद में इन कथाओं का आविष्कार किया | (26.xxi ) राव (109.i i i और आगे) और कैनेडी (61. 353 और आगे) जैसे विद्वान इन कथाओं का संकलन पहले ही कर चुके हैं। हमें नए सिरे से इनके आद्योपांत विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे उद्देश्य के लिए एक या दो उदाहरण ही पर्याप्त होने चाहिए ।
कभी कभी यह भी दावा किया गया कि गणपति एक पुरुष से उत्पन्न हुए थे, बिना किसी.
स्त्री के (वी. क्यू. ।935. 105) | फिर यह कहा गया कि वह पुरुष के सहयोग के बिना एक स्त्री के गर्भ से जन्मे (26.7) । इससे कम से कम यह संकेत मिला कि एक देवता के रूप में गणपति का जन्म सामान्य ढंग से नहीं हुआ था । इसके अतिरिक्त गणपति के जन्म के साथ एक प्रकार की अपवित्रता की भावना जुड़ी हुई थी और जिसे पुराणों में पूर्ण रूप से दूर नहीं किया
जा सका था।
एक विशेष कथा है कि पार्वती एक बार अपने ही शरीर के मल के साथ, खेल रही थी और उन्होंने इस मल को एक आकार दे दिया । यह कथा ‘स्कंद पुराण” “ब्रह्मवैवर्त पुराण” आदि में आई है। यह एक विचित्र आकार था जिसके प्रति पार्वती स्वयं आकृष्ट हो गई और उन्होंने इसमें प्राण फूंके और इसे अपना पुत्र कहा। एक अन्य कथा इससे भी बढ़कर है। पार्वती जिस उबटन. को अपने शरीर पर मलती थीं उसमें अपना मल मिश्रित करके वह गंगा के उद्गमस्थल पर गई और एक हस्तिमुख वाली मालिनी नामक राक्षसी को यह मिश्रण पीने के लिये बाध्य किया। इसके परिणाम स्वरूप मालिनी के गर्भ से एक बालक जन्मा, जिसे पार्वती ले गई (ई० आर० ई०i i .808)। इस प्रकार गणपति को देवताओं की श्रेणी में एक दत्तक के रूप में लाया गया न कि जन्म से।
गणपति का हस्तिमुख कैसे ‘बना
इसके बावजूद यह स्पष्ट सहीं हो पाया कि गणपति का हस्तिमुख कैसे ‘बना । इस समस्या के कारण पौराणिक साहित्य और कठिनाइयों में पड़ गया । ‘ब्रह्म बैवर्त पुराण के अनुसार जन्म के पश्चात शीघ्र ही गणेश पर शनि की दृष्टि पड़ी और गणेश कट गए, इसलिए विष्णु ने शोकग्रस्त माता पर दया करके एक हाथी का सर उस बालक के शरीर पर लगा दिया (वही) । कितु स्क॑द पुराण” में यह कथा स्वीकार नहीं की गई [(विश्व कोश (ब) ५.82-3) | । इस पुराण के अनुसार गणेश का सिर जन्म से पूर्व ही नहीं रहा था।
सिंदूर नामक एक दैत्य माता के गर्भ में प्रविष्ट हो गया और उन्होंने गर्भस्थ बालक का सिर खा लिया । जब बालक जन्मा तो उसे अपने लिए स्वयं ही एक सिर प्राप्त करना पड़ा। उसने गजासुर नामक हस्ति दानव का सिर काटा और अपने शरीर पर लगा लिया। यह स्पष्ट नहीं हुआ कि इस बालक को ऐसा भोंडा दिखने वाला सिर ही क्यों पसंद आया ।
दक्षिण भारत के ‘सुप्रभेदागम’ में एक अति विलक्षण स्वाभाविक स्पष्टीकरण दिया गया है (वो० क्यू० 935.05)। एक बार शिव और पार्वती ने हस्तिमुद्रा में संभोग किया जिससे हस्तिमुख वाला बालक उत्पन्न हुआ। हस्तिमुख वाली राक्षसी मालिनी या राक्षस गजासुर के साथ गणेश का संबंध जोड़ने वाली कथाओं से संकेत मिलता है कि बाद में रचित कथाओं के आवरण में यह तथ्य छिपा है कि गणेश के पूर्वज मूल रूप से आदिवासी राक्षस और राक्षसी थे।
एक और कथा जो कई पुराणों में आती है उससे भी यही आभास मिलता है (6.354)। इंद्र के नेतृत्व वाले अभिजात देवतागण शिव के निवासस्थल सोमनाथ के पर्वतीय क्षेत्र में, नीच जाति वाले शूद्रों तथा उनकी स्त्रियों के एक समागम से डर गए। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की कितु उन्होंने इस सभा को नहीं रोका । तब सभी देवता शिवपत्नी पार्वती के पास पहुंचे । उन्होंने इस जनसमूह के विनाश के लिए अपने शरीर के मल से एक विपत्तिकारक देवता का सृजन किया। हो सकता है कि इस पौराणिक कथा में कुछ सचाई रही हो, लेकिन इसे उलट कर प्रस्तुत किया गया है।
हम पहले ही देख चुके हैं कि मनु ने गणेश को शूद्रों का देवता घोषित किया। यह मानने के भी पर्याप्त कारण हैं कि गणपति के अनुयायियों में स्त्रियों का दर्जा पुरुषों के बराबर था (शंकर विजय’ खं. ५५ ) | इसलिए गणपति का जन्म शूद्रों और उनकी स्त्रियों के समागम को रोकने के लिए नहीं हुआ होगा । जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि गणपति नाम वास्तव में साधारण जनों को समूहीकृत करने से संबद्ध रहा होगा वह उनके नेता रहे होंगे न कि उनका विनाश करने वाले ।
एक और बात विशेष महत्व की है। गणपति का एक अन्य नाम है द्वि-देहक (26.558५)
इसका अर्थ है दो शरीरों वाला। गणपति वास्तव में ऐसे ही थे। उनके दो शरीर, दो व्यक्तित्व,दो जन्म थे : एक पहला और एक बाद का। एक अश्लील और एक पवित्र, विध्नकर्ता और सिद्धिदाता । हम गणेश के सिद्धिदाता वाले रूप से अधिक परिचित हैं क्योंकि बाद के काल में इसी रूप का अधिक प्रचार किया गया ।
विघ्नराज का रूपांतरण
विध्नराज का रूपांतरण सिद्धिदाता में कब हुआ इस संबंध में मोटा अनुमान लगाना हमारे लिए संभव है। कोडिंगटन की ‘एंशेंट इंडिया’ में गणपति की एक ऐसी प्रतिमा का उल्लेख है जिसमें वह पूर्ण वैभव और साजसज्जा के साथ दिखाए गए हैं (प्लेट 455) । यह मूर्ति ईसवी सन् पांच सौ के आसपास की मानी जाती है और इसे गणपति को नए रूप में प्रस्तुत करने वाली प्रारंभिक मूर्तियों में से एक समझा जाता है।
कुमारस्वामी ने इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि ‘गुप्त राजाओं के शासनकाल से पहले के मूर्तिशिल्प में गणेश की कोई मूर्ति नहीं है,
और ‘गणेश की प्रतिमाएं अचानक ही ग्रुप्तकाल में बनीं और ये दुर्लभ नहीं थीं! (बी.एम.एफ. ए.बी. ०5 35) । काणे का अनुमान है कि गणेश की वैविदित विशेषताएं और उनकी पूजा, ईसवी सन् पांच सौ या छः सौ से पूर्व होने लगी थी (8. #. 25)। ये सभी अनुमान पुराणों में उपलब्ध प्रमाणों से मेल खाते हैं। यद्यपि पुराण इससे भी पहले के रहे होंगे। विद्वानों ने सिद्ध किया है कि गुप्त राजाओं के शासन काल में ब्राह्मणीय साहित्य नए सिरे से लिखा गया (2.23, 2.38) । इस प्रकार हमें कुछ आभास मिल जाता है कि गणेश या गणपति किस कालांश में देवता बन गए । यह समय गुप्त काल से कुछ ही पहले रहा होगा ।
अब हम कुछ अधिक आलोचनात्मक दृष्टि से गणपति की विशेषताओं का अध्ययन करेंगे। इससे आभास मिल सकेगा कि गणपति किस प्रकार देवता बने। इसका संकेत उनके हस्ति मुख से मिलेगा | हम यह मानने के अभ्यस्त हो गए हैं कि गणपति का हस्तिमुख प्रारंभ से ही था ।कितु वास्तव में ऐसा नहीं है।
https://www.facebook.com/SatatChhattisgarh