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“क्लासरूम” (पूनम वासम की कविता)

पूनम वासम

by satat chhattisgarh
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Classroom

वह बार बार आता है मेरे पास अपनी स्लेट पकड़े
मैं झिड़क कर दूर भगा देती हूँ उसे
पेंसिल पकड़ी हुई उंगलियों से बहती नाक पोछता हुआ ढीठ की तरह खड़ा रहता है
मुझे उसकी बहती नाक से इंफेक्शन होने का डर हमेशा सताता है

कभी कभी आते जाते उसकी बिना बटन वाली
गन्दी शर्ट का उड़ता हुआ टुकड़ा मेरे दुपट्टे से छुआ
जाता है उस दिन मैं डेटॉल की सारी बॉटल
उड़ेल देती हूँ सर्फ़ एक्सेल के साथ
उसके लिए नए अक्षरों को पहचानना मुश्किल काम नहीं
पर मैं जान बूझकर उसके बालों में पड़े जुओं की बात छेड़ देती हूँ ताकि शर्म से उसका सिर झुकता जाए
पर वह महाढीठ की तरह आँखों में आंखें डालकर अपनी फटी पेंट का कोना थामे खड़ा रहता है

कभी कभी तो हद ही कर देता है
स्लेट पर लिखी हुई आड़ी तिरछी लकीरों को थूक से मिटाता फिर लिखता फिर मिटाता
मेरे बिल्कुल करीब आ कर खड़ा हो जाता है
तब तक मैं उसे डाँटते हुए उसके पैरों के नाखूनों पर
आधा घण्टा खत्म कर चुकी होती हूँ

मुझे उसकी शक्ल में उसका पीला दाँत देखते ही
उबकाई आने को होती है
लंच के वक्त भी उसके हाथ थामे रखते हैं हमेशा
पेंसिल और स्लेट ऐसे जैसे उसकी भूख का
स्थायी समाधान यही हो

पूरा दिन उसकी आँखें मेरी उंगलियों पर टिकी रहती हैं जैसे धरती टिकी हो कृष्ण की एक उंगली पर
मैं उसके लिए ध्रुव तारा हूँ

कभी कभी उसके हाथ पाँव कपड़े बाल
सब धूल मिट्टी से मिले हुए होते हैं
उस दिन मैं अक्सर बचती हूँ उसके जंगल जैसे
उग आए घने बालों की झड़ती हुई धूल से

उस दिन वह ज्यादा ही ढिठाई दिखाते हुए
मेरी कुर्सी के हत्थे को छूने की कोशिश में थोड़ा आगे आकर खड़ा हो जाता है

मैं झिड़कते हुए साफ सफाई के फायदों पर पूरा पैंतालिस मिनट खर्च कर देती हूँ
जंगल के बच्चे जंगली ही होंगे
इस वाक्य पर जोर देते हुए अपनी कही गई बात पर अभिमान करते हुए
जरा दूर खिसका लेती हूँ अपनी कुर्सी

वह हर रोज मेरे पाँव छूता है
उसके हाथों की छुवन के चलते मैंने अपने नाखूनों को खुला नहीं छोड़ा
मुझे डर लगता है कहीं उसकी कोई आदत
मेरे लिए मुश्किलें न खड़ी कर दे

पेंसिल का टुकड़ा और पत्थर की स्लेट जैसे अचूक टोटका हो उसके लिए
मैंने सुनी सुनाई में सुना भी है
कि टोटके ताकत रखते हैं ग्रहों की स्थितियाँ
बदल देने की!

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