अपने अधिकार अपने सपनों के लिए
अपने ख्यालों की आजादी के लिए
जीवन में समाज में यदि कुछ करना है
कुछ बनना है तो सबसे पहले
चूल्हे की लकड़ी
और कूल्हे की हड्डी बनना होगा
मधुमक्खी का छत्ता बनना होगा
भूख मिटाने के लिए
बनते हुए भात का माढ़ बनना होगा
सहवास में संभोग का साधन नहीं
खुद की इच्छाओं का साथी बनना होगा
हृदय की गति नहीं
रक्त की धमनियां बनना होगा
हींग तुलसी सोंठ अदरक हल्दी ही नहीं
शिव को चढ़ने वाला धतुरा बनना होगा
घर के मुंडेर पर चहकने वाली
चिड़िया बनना होगा
घर का पर्दा नहीं और खाट का पटिया नहीं
दरवाजे की कील बनना होगा
ताले की चाबी नहीं
खुद ही ताला बनना होगा
गमले का पौधा नहीं नींबू का बीज नहीं
नीम का पेड़ बनना होगा
पहाड़ नहीं कल-कल करती नदी बनना होगा
पहाड़ की तय चोटी को फिर नीचे आना होता है
नदी जंगल हरा करती पहाड़ तोड़ती हुई
अपना रास्ता खुद बनाती
अपनी इच्छाशक्ति के वेग से निर्बाध बहती
नदी का प्रवाह बनना होगा
दबी हुई चीख नहीं, ठहाकों की गूंज बनना होगा
शोर नहीं बुलंद आवाज बनना होगा
औरतों खुद को परखने और आजमाने का
वक्त खुद ही को बनना होगा
मुकाम अपना बनाने के लिए तुम्हें वेश आदमी का नहीं
औरत का ही बनाए रखना होगा।
जिंदगी धूप और छांव का खेल है
तुम्हें बारिश बनना होगा।
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