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मायनी कुरसम के लिए (कविता )

पूनम वासम

by satat chhattisgarh
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Poem

कहानियाँ ग्लोबल होने की ज़िद करती हैं
कविताएँ अमूर्तन माँगती हैं
गद्य लय माँगता है

अब सोचती हूँ तुमको किस विधा में पिरोऊँ
तुमको पढ़ा जाए बिल्कुल वैसा, जैसा तुम चाहती हो

तुम्हारा मन ‘दंडक गुफा’ के द्वार की तरह है
यदि बाहर से लौटा कोई तो ख़ाली हाथ ही लौटेगा

तुमने पढ़ रखी है ‘नव साक्षर’ वाली किताब की सारी कविताएँ
लिख लेती हो चट्टानों पर कुछ एक वाक्य
बना लेती हो चित्र बेचैन हुई चिड़िया का
जंगल की हवा, जंगल का पानी, जंगल की मिट्टी तुम्हें पहचानती है

पूनम वासम की कविता “कॉमरेड हो जाना”

इनके बाहर तुम्हारी पहचान के लिए तुम्हारे पास कोई पहचान नहीं

अस्पताल के उस कमरे में तुम्हें हर चीज़ नई लगी
इंजेक्शन की सुई ने तुम्हारे शरीर को पहली दफ़ा छुआ
हालाँकि की स्त्री-देह होने का तजुर्बा
‘पानी पकड़ते’ वक़्त दबोच ली गई तुम्हारी देह को
बहुत पहले ही हो चुका था

हड्डियों के टूटने और उनके देशी नुस्ख़े से जुड़ जाने वाली बात तुम्हें पता है
तुम्हारी हड्डियाँ कितनी नाज़ुक हैं यह बात उन्हें पता थी
छाती से योनि तक का सफ़र तय करना उनके लिए
चुटकी वाली बात थी

एफ़आईआर की कॉपी में लिखी हर बात तुम्हारे लिए नई बात थी
उस दिन पीड़ा की अंतिम पीड़ा से गुज़रते हुए तुमने पहली दफ़ा समझा
रात की बात को रात की तरह

तुम्हारी हड्डियाँ टूटकर चूर हो चुकी थीं
उन्हें जोड़ते हुए ख़र्च करने के लिए
तुम्हारे पास कोई जड़ी-बूटी नहीं बची थी

मायनी कुरसम, तुम कहती हो जंगल की पगडंडी पर
खड़ी होकर
गाँव, घर, खेत की मेड़ से खुलकर अपनी बात
जंगल के बाहर की दुनिया कहाँ सुन पाती है तुम्हारी आवाज़

तुम गाती हो अपनी भाषा में अपनी कहानी का दर्द
दुनिया बेचती है तुम्हारी देह की ताज़ा तस्वीर
तुम्हारी खुली हुई देह पर गुदे हुए गुदने के साथ
तुम अख़बारों के पहले पन्ने पर छपती हो फ़ुल पेज

अजायबघर की दीवार पर दोनों हाथ जोड़कर खड़ी
तुम्हारी बड़ी-सी तस्वीर इन दिनों चर्चा में है

तुम्हारी तस्वीर के साथ हर कोई अपनी तस्वीर खींचकर लगाना चाहता है
सोशल मीडिया की दीवार पर

तुम्हें पढ़ा जा रहा है इन दिनों ऐसे
जैसे तुम ‘एंथ्रोपोलॉजी’ की कोई बेजान-सी किताब का कोई पन्ना हो

अब क्या ही लिखूँ तुम पर कुछ
कि तुम ख़ुद ही एक भरम बनती जा रही हो मेरे लिए
जिसको जैसा समझना हो वो वैसा समझ ले

लेकिन ‘मायनी कुरसम’ तुम मेरी
किसी कविता या कहानी का पात्र
कभी नहीं बन सकतीं
चूँकि इन दिनों मुझको भी
कविताएँ लिखने का शऊर आता है।

 

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