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तुम हो मगर तुम कौन हो? कविता “प्रकाश श्रीवास” की

by satat chhattisgarh
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तुम हो मगर तुम कौन हो
तुम सुबह सुबह सूरज की किरणे ओढ़कर आती हो
तुम मुझे नींद से जगाने अपना सारा काम छोड़कर आती हो
बादल से टूटकर बारिश बनकर तुम ही जमीं पर हो
और तुम ही आखों की नमी पर हो

 

घर की खिड़कियों से अंदर आती हुई धूप हो
किसी खुबसूरत अपसरा का कोई रूप हो
सुनसान गलियों में तुम गूंजती हुई आवाज हो
टूटे हुए बंजर मकानों में दबी कोई राज हो

 

तुम्हारी आखें कातिलाना है जैसे वो कोई तलवार हो
सारे लिबास तुम पे जंचते है चाहे वो जींस हो कुर्ती हो या सलवार हो
तुम से रूबरू होकर चेहरे की रंगत बदलती है
तुम से जो भी आज बात करता है कल उसकी संगत बदलती है

 

तुम इतनी सच्ची हो की झूठ को भी तुम पे एतबार हो जाता है
ज्यादातर जो तुमसे पहली बार मिलते है
उन्हें झूठा ही सही मगर प्यार हो जाता है
हर एक जुबां तुम्हारी तारीफ करने को तैयार रहते हैं
खुशनसीब है वो जो तुम्हारे आस पास हर बार रहते है

 

तुम किसी शायर का खूबसूरत ख्याल हो
तुम संगीत की धुन हो सुर हो ताल हो
तुम साफ दिल की हो तुम नाजुक हो
तुम फूल हो तुम ख्वाब हो तुम दुआ हो
तुम दवा हो तुम हंसी हो खुशी हो तुम किताब हो
महताब हो तुम लाजवाब हो

तुम हो मगर तुम कौन हो??

प्रकाश श्रीवास

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